Monday, September 23, 2013

कांग्रेस की पाती...


गौरव शर्मा "भारतीय" 
मैं कांग्रेस हूँ… कांग्रेस पार्टी, जिसे 72 प्रतिनिधियों ने 28 दिसंबर 1885 को मुंबई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय में जन्म दिया था। शुरूवाती दिनों में मेरा दृष्टिकोण एक कुलीन वर्गीय संस्था का था। अपने जन्म के कुछ ही वर्षों बाद मैंने वर्ष 1907 में विभाजन की पीड़ा झेली और आज तक झेल ही रही हूँ। कभी मुझे गरम दल और नरम दल के नाम से विभाजन की पीड़ा से दो चार होना पड़ा तो कभी इंदिरा गाँधी के आत्मसम्मान की रक्षा के लिए मेरा विभाजन किया गया। उन विभाजनों की पीड़ा को मैं आज भी महसूस करती हूँ पर आज की स्थिति में हर रोज और हर क्षण जिस तरह मेरा विभाजन हो रहा है उसके सामने वह पीड़ा कुछ नहीं है। लाल-बाल-पाल और गोखले-नौरोजी ने तो मेरा विभाजन सिद्धांतों और आजादी की लड़ाई में जीत के उद्देश्य से किया था। लेकिन आज के नेता मेरा विभाजन अपने सत्ता सुख के उद्देश्य के लिए कर रहे हैं, एक बार नहीं बार-बार कर रहे हैं। अब मैं इतना टूट चुकी हूँ, इतनी बिखर चुकी हूँ कि मुझे खुद का असली चेहरा भी याद नहीं रहा। मैंने आजादी की लड़ाई लड़ी, महात्मा गांधी ने मुझे नेतृत्व दिया। नेहरु और पटेल ने मुझे जीवनभर मजबूती दी। समय के साथ मुझे सुभाषचन्द्र बोस जैसा अध्यक्ष भी मिला जिसने पूरे देश को एकता के सूत्र में पिरोकर जन-जन के मन में देशभक्ति के पौधे को सिंचित किया पर आज न जाने कैसे-कैसे लोग मेरा नेतृत्व करने का दावा कर रहे हैं? कोई त्याग की प्रतिमा कहलाने के लिए देश को एक निरीह, लाचार और बेबस इंसान के हवाले कर मुझे कमजोर कर रहा है तो कोई बाहें चढ़ाकर मेरे नाम से देश की मासूम जनता को धमकी दे रहा है। समझ नहीं आता है कि कौन नरम दल का है और कौन गरम दल का ? नरमी और गरमी के इस नाटक को जब भी मैं समझने का प्रयास करती हूँ, खुद ही उलझ कर रह जाती हूँ ! मैं मानती हूँ कि मेरे जन्म के समय एओ ह्यूम एक ऐसी संस्था चाहते थे जो अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीयों की हो। एक ऐसी संस्था, जो ब्रिटिश सरकार की भक्त हो पर राष्ट्रवादी नेताओं के राजनीति में प्रवेश के बाद मुझे राष्ट्रवादी संस्था होने का गौरव भी प्राप्त हुआ। मैं पढ़े लिखे भारतीय अंग्रेजों की गिरफ्त से निकलकर मजदूर और किसानों तक जा पहुंची। लोगों के दिलों में बसने लगी। देश की आजादी के लिए लोग मुझे आशा भरी निगाहों से देखने लगे। मैंने आम जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने का प्रयास भी किया पर आज लोग मुझे अविश्वास की नजर से देखने लगे हैं, मेरा माखौल उड़ाते हैं। जो भारत मेरे रग-रग में बसता है उसे मुझसे मुक्त करना चाहते हैं। शायद वे सही भी हों क्योंकि जिस तरह आज मेरे नाम का दुरूपयोग हो रहा है इसके पहले कभी नहीं हुआ है। कभी नेहरु, पटेल, सुभाष और शास्त्री कांग्रेसी कहलाया करते थे और मुझे उनपर गर्व हुआ करता था। जब लोग उन्हें सम्मान देते थे तो मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता था पर आज कलमाड़ी, सुखराम और न जाने कैसे-कैसे लोग खुद को कांग्रेसी बताकर कांग्रेस के सिद्धांतों और रीति नीति के साथ बलात्कार कर रहे हैं। जिस देश में आजादी के पहले केवल भारतीय बसा करते थे वहां हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, तमिल, तेलगु, कन्नड़ और न जाने कितने लोगों को बसा दिया। भारत को जाति, धर्म प्रांत और न जाने किन-किन विभक्तियों में बाँट दिया। भाई को भाई से अलग करने और लड़ाने का हक किसने दिया था इन मौकापरस्त नेताओं को ? जिस जनता ने इन नेताओं को चुनकर भेजा इन्होंने उसे भी नहीं छोड़ा। जनता आज भी दो वक्त की रोटी के लिए तरस रही है पर कुछ लोग 35 लाख का शौचालय बनाकर राष्ट्र की सेवा कर रहे हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स के नाम पर कॉमन मेन के वेल्थ से ही गेम कर गए। इन नेताओं की कारस्तानी की वजह से कब तक मैं बदनामी का बोझ अपने सर पर लेकर फिरती रहूँ ? और कब तक ऐसे नेता मेरे नाम को बदनाम करते रहेंगे ? आज मुझे महात्मा गांधी की वह बात याद आती है, उन्होंने कहा था कि आजादी मिल गई है कांग्रेस को अब समाप्त कर दो ! वाकई उस समय अगर मेरा विसर्जन हो गया होता तो आज मुझे इतनी जिल्लत न सहनी पड़ती। अंत में मैं बस यही कहना चाहती हूँ कि असली कांग्रेसियों को पहचानो, उन कांग्रेसियों को पहचानो जो आज भी मेरे सिद्धांतों पर चल रहे हैं। केवल ऐसे लोगों को अपना समर्थन दो जो देश को आगे बढाने में लगे हैं न कि देश का बंठाधार कर खुद का विकास कर रहे हैं।
वन्दे मातरम !
(प्रदेश व देश के विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित आलेख)

स्वामी विवेकानंद की पाती...


स्वामी विवेकानंद की पाती...



गौरव शर्मा "भारतीय" 
मैं नरेंद्र वैसे आप मुझे विवेकानंद के नाम से जानते हैं। धर्म और आध्यात्म की वर्तमान दशा पर विचार करने एक बार फिर उपस्थित हूँ। भारतवर्ष के ज्ञानवान, परम प्रतापी सन्यासी वर्तमान में धर्म और आध्यात्म की जो सेवा कर रहे हैं उसे देखकर मैं भावुक हो जाता हूँ, मेरी आँखें छलक उठती हैं। मैंने मानवसेवा को ही सबसे बड़ा धर्म माना और मानव में ही ईश्वर के दर्शन किए। बड़े-बड़े महलों और आश्रमों में मुझे कभी ईश्वर नहीं मिले और न आध्यात्म के उच्च आसनों को प्राप्त ही कर सका पर आज के तपस्वी संतों को ईश्वरत्व की प्राप्ति महलों से भी अधिक आलिशान आश्रमों और मंदिरों में ही होती है। भारतवर्ष के कुछ चमत्कारिक संत स्वयं में ईश्वर के दर्शन भी कराने लगे हैं और जनता को भी अब नारायण दरिद्र में नहीं राजसी संतों में ही नजर आने लगे हैं। मुझे ज्ञान था कि भारत तरक्की कर रहा है पर इस बात से मैं अनजान था कि वैज्ञानिकों से भी अधिक तरक्की भारत के संत समुदाय ने की है। जानकर हैरानी होती है कि कुछ संत इतने आधुनिक हो गए कि किरपा भी मोबाइल के मैसेज की तरह भेजने लगे हैं। ब्रम्हचर्य और आत्मनियंत्रण को मैंने आध्यात्म का पहला चरण माना। प्रत्येक नारी को माँ का स्थान दिया पर आज के महान संतों ने तो नारी की अस्मिता को अपनी पैतृक संपत्ति समझ ली, उसे कुचलने और मसलने लगे, वाकई महान हैं ऐसे संत। मैंने इसी भारतवर्ष में स्पष्टत: कहा था कि ब्राह्मण हो या सन्यासी, किसी की भी बुराई को क्षमा नहीं मिलनी चाहिए पर आज मैं देखता हूँ कि कुछ अज्ञानी और धर्मांध लोग पापियों के बचाव में खड़े हो गए हैं। धर्म और अध्यात्म के नाम पर चल रहे बाजार के सबसे बड़े तिजारती बनकर इतरा रहे हैं। मैं संतों का अनुशरण करने वाले भारतवर्ष के हजारों लाखों अंधभक्तों से पूछना चाहता हूँ कि क्या तुमने कभी अपने गुरु की परीक्षा ली है? मैंने तो लगातार चार वर्षों तक हर तरह से अपने गुरु की परीक्षा ली और जब मुझे स्वामी रामकृष्ण परमहंस में विश्वास हुआ तब मैंने उन्हें गुरु के रूप में स्वीकार किया। मैं भारत की सनातन धर्म में आस्था रखने वाले हजारों-हजार बहनों और भाइयों से पूछता हूँ कि आखिर क्यों किसी भी तथाकथित संत के बहकावे में आकर उन्हें अपना सब कुछ सौंप देते हो? भारतवासियों, दर्शन, विज्ञान और अन्य किसी भी विधा की थोड़ी भी सहायता न लेकर मेरे गुरु श्रीरामकृष्ण परमहंस ने विश्व इतिहास में पहली बार घोषणा की कि सभी धर्म मार्ग सत्य हैं। अंग्रेजी शिक्षा के अभिमान में डूबे लोगों को फटकारते हुए स्वामी जी ने कहा था कि, `ऐ पढ़े लिखे मूर्खों ! अपनी बुद्धि पर वृथा गर्व न करो` कभी मैं भी करता था, किन्तु विधाता ने मुझे ऐसे व्यक्ति के चरणों में अपना जीवन मंत्र पाने को बाध्य किया जो निरक्षर महाचार्य, घोर मूर्तिपूजक और दिखने में पागल जैसा था। मेरे गुरु पुरुष और स्त्री, धनी और दरिद्र, शिक्षित और अशिक्षित, ब्राह्मण और चंडाल, इन सब भेदभावों से ऊपर उठ चुके थे और उनकी यही बात मुझे उनके प्रति आकर्षित करती थी। मैं पूछता हूँ कि आज ऐसा कौन गुरु या संत हैं जिनके भीतर वैसी ईश्वर भक्ति, वैसी क्षमता या वैसा दिव्य ज्ञान है? स्वामी जी शांति के दूत थे, मानवता की जीवंत प्रतिमूर्ति थे। यही वजह थी कि मैं ईश्वर को पाने के लिए विक्षिप्त की तरह भटकता हुआ उनके पास पहुंचा और उन्होंने मुझे साक्षात ईश्वर के दर्शन करा दिए। स्वामीजी ने हम सभी शिष्यों को अभाव में रहने की शिक्षा दी और स्वयं अपना जीवन अभावों में ही व्यतीत किया। वे अक्सर कहा करते थे `रुपया आग है, उसके संपर्क में आओगे तो जल जाओगे` उन्होंने जीवन में मुद्रा का स्पर्श तक नहीं किया। आज है कोई सन्यासी जो ऐसा करता हो? हमें ज्ञान देते समय कभी उन्होंने भेदभाव नहीं किया। आगे बैठने वाले शिष्यों से अधिक धन और पीछे बैठने वाले शिष्यों से कम धन नहीं लिया। कभी दसवंद की मांग नहीं की। कभी अपने फोटो की पूजा ईश्वर की तरह करने की सीख नहीं दी। कभी उन्होंने नागिन डांस नहीं किया। आध्यात्म के नाम पर गाने बजाने का भौंडा प्रदर्शन नहीं किया। रहा सवाल मेरा, तो मैं ठहरा फकीर, विदेशों में चार वर्ष बीता दिए पर पैसों को छूने की जरूरत न पड़ी। अब तुम ही तय करो कि तुम्हे कैसा संत और कैसा गुरु चाहिए ? भारतवर्ष की वर्तमान युवा पीढ़ी को देखकर भी मैं चिंतित हूँ कि क्या ये वही युवा हैं जिनके आधार पर मैंने भारत को विश्वगुरु के पद पर पुन: स्थापित करने का स्वप्न देखा था ? क्या ये वही युवा हैं जिन्हें मैंने उठो, जागो और लक्ष्य की प्राप्ति तक मत रुको का संदेश दिया था ? मैं फकीर था, हूँ और रहूँगा ! सन्यासी और परिव्राजक बनने के पहले भी मेरे पास कुछ नहीं था और सन्यास ग्रहण करने के बाद भी, मैं तो बस यही कहना चाहता हूँ कि उठो, जागो और धर्म व आध्यात्म के नाम पर चल रहे बाजार को बंद करो।
आशीर्वाद
विवेकानंद
(प्रदेश व देश के विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित आलेख)

Wednesday, September 4, 2013

निर्भया की पाती...


निर्भया की पाती...
 गौरव शर्मा "भारतीय"
दामिनी, निर्भया, देश की बेटी और भी न जाने देश ने मुझे कितने नाम दिए ! मुझे न्याय दिलाने पूरा देश खड़ा हो गया पर क्या मुझे न्याय मिला ? यह केवल मेरा प्रश्न नहीं बल्कि देश की उन हजारों लाखों दामिनी और निर्भया का प्रश्न है जो समाज की गंदी मानसिकता का शिकार बन रही हैं। `नारी` शब्द से ही प्रतीत होता है कि नर स्वयं इसमें समाहित है। एक नारी ही नर, नारी व नारायण तीनों को उत्पन्न करती है, इसलिए नर से भी उत्तम स्थान नारी का है। `यत्र नारी पूज्यन्ते,रमन्ते तत्र देवता` यह एक अकेला वाक्य नारी के बारे में सम्पूर्ण ज्ञान कराने में सक्षम है पर मैंने कभी नहीं कहा कि मेरी पूजा की जाए। कोई नारी कभी पूजनीय नहीं बनना चाहती। कोई नहीं चाहती कि उसे उपासना की वास्तु बनाकर घर के किसी कोने में कैद कर दिया जाए या पुरुष उनके नाम की माला जपते नजर आएं। लेकिन इसका यह भी अर्थ नहीं है कि उसके मान सम्मान और प्रतिष्ठा का बीच चौराहे पर मजाक बनाया जाए। मेरे साथ उन दरिंदों ने दुष्कर्म किया, मुझे सड़क पर निर्वस्त्र फेंक दिया पर उसके बाद क्या हुआ ? सड़क से गुजरने वाले हर इंसान ने मुझे हैरत और वासना की नजर से देखा मगर मेरे तन पर एक कपड़ा डालने की जहमत भी नहीं उठाई। तो क्या उन्होंने मेरे साथ दुष्कर्म नहीं किया ? आज हजारों युवतियां समाज के इसी दुष्कर्म और दुर्व्यवहार की शिकार हो रही हैं इसलिए आज भी यह प्रश्न प्रासंगिक है। बेटी का जन्म होने पर ख़ुशी तो होती है पर मन में कसक भी होती है कि काश बेटा हुआ होता… वहीँ से बेटी और बेटे का फर्क प्रारंभ हो जाता है जो जीवन भर साथ चलता है। बात-बात पर बेटी को कमजोर होने का अहसास कराया जाता है, आखिर क्यों ? हमारे देश में कल्पना चावला, सुनीता विलियम्स और प्रतिभा पाटिल का उदाहरण तो दिया जाता है पर जब कोई बिटिया उस दिशा में कदम बढ़ाती है तो आसपास के लोग ही उसके बेटी होने का अहसास कराकर कदम पीछे खींच लेते हैं। काश, जो लोग बेटी को बेटी होने का अहसास कराते हैं वे बेटे को भी आदर्श बेटा बनने की प्रेरणा देते। बेटे को अहसास कराते कि नारी उपभोग की वस्तु नहीं सम्मान की परिभाषा है। न्याय और व्यवस्था से तो मैं उसी दिन नाउम्मीद हो चुकी थी जिस दिन मैं समाज की गंदी सोच का शिकार बनी पर आज मुझे देश के उन लाखों युवाओं ने भी निराश कर दिया है जो मुझे न्याय दिलाने के लिए डंडे और लाठियां खाने से भी पीछे नहीं हटे थे। उसी जोश और आत्मविश्वास की आवश्यकता आज भी है जब देश के तमाम हिस्सों में युवतियों को जबरन `दामिनी और निर्भया` बनने पर मजबूर किया जा रहा है। मुझे हैरत होती है जब देश में झालियामारी जैसे कांड हो जाते हैं उसके बावजूद देश की जनता खामोश होती है जहाँ 36 मासूम बच्चियों को दुष्कर्म का दंश झेलना पड़ता है। मुझे तब भी अफ़सोस होता है जब नारी की महत्ता का गुणगान करने वाले संत पर दुष्कर्म का आरोप लगता है और कथित आरोपी को बचाने के लिए देश के राजनीतिज्ञ खड़े हो उठते हैं। ऐसी स्थिति में आखिर कैसे कोई `निर्भया` न्याय की उम्मीद कर सकती है? कैसे हजारों दमिनियों को देश के कानून और व्यवस्था पर विश्वास हो सकता है? मैं तो ईश्वर की शुक्रगुजार हूँ कि उन्होंने मुझे अपने पास बुला लिया पर आज भी मेरी आत्मा उन हजारों `दामिनी और निर्भया` में बसती है जिन्हें जीवन भर दुष्कर्म का दंश झेलना होगा। काश मेरी पीड़ा को देश के कर्णधार और 121 करोड़ लोग महसूस कर पाते और किसी बेटी को दामिनी या निर्भया कहलाने की जिल्लत न उठानी पड़ती।
(लेखक छत्तीसगढ़ के युवा पत्रकार व साहित्यकार हैं)

बापू की पाती मनमोहन के नाम...


बापू की पाती मनमोहन के नाम...
  
 गौरव शर्मा "भारतीय"
प्रिय मनमोहन,
काफी दिनों से आपको पत्र लिखने का विचार कर रहा था पर आज देश की वर्तमान व्यवस्था ने मुझे आपको पत्र लिखने पर मजबूर कर दिया। मैं लंबे समय से आपका प्रशंसक रहा हूँ क्योंकि बुरा न देखो, बुरा न सुनो और बुरा न कहो के मेरे सिद्धांतों का आपने अक्षरशः पालन किया है। बुरा होते देख आप अपनी आँखें बंद कर लेते हैं। बुरी बातों को सुनकर आप कानों पर ऊँगली देते हैं पर बुरा कहने के संबंध में मैं टिपण्णी करने में असमर्थ हूँ क्योंकि मैंने आपको कुछ खास मौकों पर ही बोलते सुना है, शायद तब भी आप बोल नहीं, पढ़ रहे थे। मेरे अहिंसा के सिद्धांतों को भी आपने बखूबी अपनाया है। एक गाल पर तमाचा मारने पर जिस तरह मैंने दूसरा गाल आगे बढ़ाने की बात कही ठीक उसी तरह आपने एक बार पाकिस्तानी सेना द्वारा भारत के पांच सैनिकों का शीश काटने के बाद चीन को अपने देश में घुसपैठ करने का अवसर दे दिया पर हिंसा नहीं होने दी। देश आपके कुशल नेतृत्व में इन दिनों काफी तरक्की कर रहा है। ए. राजा, कनिमोझी और कलमाड़ी जैसे लोगों को देखता हूँ तो वाकई ख़ुशी से मेरी आखें छलक जाती है। इतनी तरक्की तो चीन और जापान आजादी के दसियों सालों के गुजरने के बाद भी नहीं कर पाए पर भारत ने आप जैसे महान नेताओं के नेतृत्व में महज 67 वर्षों में ही अच्छी तरक्की की है। कुछ बातों से मैं परेशान भी हूँ। बड़ी पीड़ा होती है जब भारतीय मुद्रा की डॉलर के सामने घुटने टेकने की खबरें सुनता हूँ। भारतीय मुद्रा में मेरी फोटो छपी है और जब-जब भारतीय मुद्रा डॉलर के मुकाबले कमजोर होती है तो मुझे अहसास होता है जैसे मैंने ही अमेरिका और ब्रिटेन के सामने घुटने टेक दिए हों। ऐसा लगता है मानो मैंने ही कोई अपराध किया है जिसकी सजा मेरे देश की मुद्रा को दी जा रही है। मैं बड़ी विनम्रता के साथ आपसे आग्रह करना चाहता हूँ कि आप भारतीय मुद्रा से मेरी तस्वीर हटा दें। मेरी तस्वीर संसद भवन और विधानसभाओं से भी हटवाने की कृपा करें। जिस संस्था के भीतर सत्य और अहिंसा के साथ प्रतिदिन हिंसा की जाती हो उस संस्था के बाहर मेरी तस्वीर और प्रतिमा का काम ही क्या ? आज आपके मंत्री गरीबी और भुखमरी के नाम पर तरह-तरह के प्रयोग कर रहे हैं। हर कोई गरीबी की परिभाषा सुविधाजनक ढंग से गढ़ने का प्रयास कर रहा है। गरीबी, भूख और भोजन के साथ मैंने भी प्रयोग किया था। मैंने फल, बकरी के दूध और जैतून के तेल पर जीवन निर्वाह कर खर्चों को कम करने का प्रयास किया और इसमें सफल भी हुआ, तब मैंने आम जनता से इन साधनों पर निर्वाह करने की अपील की पर आपके मंत्री स्वयं तो टूजी, थ्रीजी और सीडब्ल्यूजी पर गुजारा करते हैं और दूसरों को 5 रूपये में भरपेट भोजन करने की सलाह देते हैं। आज देश में कांग्रेस की सरकार है, उसी कांग्रेस की जिसे किसी जमाने में हमने अपने खून से सींचा था। वही कांग्रेस जिसने देश की आजादी की लड़ाई लड़ी। आज आपको भी उसी कांग्रेस में रहते हुए एक लड़ाई लड़नी है। गरीबी भ्रष्टाचार और अनैतिकता के खिलाफ आवाज बुलंद करना है। 121 करोड़ लोगों को सम्मान और स्वाभिमान का जीवन देना है पर इसके लिए आपको अपने आसपास के कुछ लोगों का परिचय सत्य और नैतिकता जैसे शब्दों से कराना होगा। किसी जमाने में मैंने हिटलर को पत्र लिखकर अहिंसा के मार्ग पर चलने की सीख दी थी इसलिए मैं जनता हूँ कि यह कितना मुश्किल है पर आपको अपने देश को बचाने के लिए ऐसा करना होगा। मैं एक साधारण मानव था और मरने के बाद भी स्वयं को साधारण ही मानता हूँ। और आखिर में जब भी आप सत्य और न्याय की लड़ाई में मेरी आवश्यकता महसूस करेंगे मैं आपका साथ अवश्य दूंगा।
बापू के आशीर्वाद...
आपका
मो. क. गाँधी
(लेखक छत्तीसगढ़ के युवा पत्रकार व साहित्यकार हैं)

Sunday, August 18, 2013

मिनी माता की पाती


- गौरव शर्मा "भारतीय"
मैं मिनी माता… वही मिनी माता जिसकी मौत 11 अगस्त 1972 को हो गई थी. आज मेरे भतीजों (डॉ. महंत के अनुसार उनके स्वर्गीय पिता बिसाहूदास महंत को मिनी माता राखी बाँधा करती थी इस लिहाज से मिनी माता डॉ. महंत की बुआ मानी जाएँगी और महंत के ही अनुसार जोगी उनके बड़े भाई हैं तो मिनी माता उनकी भी बुआ मानी जाएँगी) ने मुझे अंतर्कलह, गुटबाजी और विषवमन का माध्यम बनाकर एक बार फिर जीवित कर दिया है या शायद मेरे विचारों, मेरे सिद्धांतों और भावनाओं का गला घोंटकर मुझे फिर से मार दिया है… आप जो समझना चाहें समझ सकते हैं! मेरी मौत के बाद से अब तक मेरे भतीजे को मेरी पुण्यतिथि मनाने की याद नहीं आई पर इस बार प्रदेश कांग्रेस का मुखिया बनने के बाद उसने चुनावी वैतरणी को पार करने के लिए प्रदेशभर में मेरी पुण्यतिथि मनाने का ऐलान कर दिया है. जोर-शोर से पूरे प्रदेश में मेरी पुण्यतिथि मनाई जा रही है पर मैं यह नहीं समझ पा रही हूँ कि पुण्यतिथि के मंच से प्रदेश को आगे बढाने और सर्वहारा वर्ग की चिंता के स्थान पर हाथ पैर काटने और आखें फोड़ने का संदेश क्यों दिया जा रहा है? मैंने तो समाज को एकता के सूत्र में पिरोने का प्रयास किया था. जातियों के भेद को मिटाकर हर वर्ग को सम्मान से जीने का हक़ देने की बात की थी पर आज मेरे तथाकथित भतीजों ने मेरे ही नाम को जातियों को बाँटने और जहर उगलने का हथियार बना लिया ? आज मैं यह सोचने पर भी मजबूर हूँ कि आखिर मैंने ऐसी कौन सी गलती की थी जिसकी सजा मुझे मेरे मरने के बाद भुगतनी पड़ रही है? क्या समाज से छुआ-छूत मिटाने का प्रयास करना मेरी गलती थी या एकता का संदेश देकर मैंने गलती की? जो समाज मुझे अपना कहकर मेरी पुण्यतिथि के बहाने राजनैतिक लाभ लेने का प्रयास कर रहा है उसे तो मैंने सम्मान और स्वाभिमान से जीने की प्रेरणा दी थी. फिर आज क्यों आँख फोड़ने और हाथ पैर काटने की धमकी देने वाले निरंकुश नेता के चरणों में उस स्वाभिमान और सम्मान को गिरवी रखा जा रहा है. मेरा बड़ा भतीजा चीख चीख कर कहता है कि मिनी माता के कामों को आगे बढ़ाना है… तो क्या लोगों के हाथ पैर काटकर और आँखें फोड़कर मेरे बचे कामों को आगे बढ़ाया जा रहा है? राजनीति मैंने भी की थी पर कभी किसी के खिलाफ विषवमन नहीं किया. मेरे ज़माने में भी गुटबाजी और आपसी मतभेद थे पर कभी किसी नेता ने हाथ पैर काटने की धमकी नहीं दी और न अपने स्वार्थ के लिए लोगों को आपस में लड़ाने का काम किया. उस समय भी प्रदेश में विद्या भैया और श्यामा भैया जैसे नेता थे जिन्होंने आपसी मतभेद के बावजूद कभी किसी के खिलाफ जहर नहीं उगला. किसी के मान सम्मान और स्वाभिमान को ठेस पहुँचाने का काम नहीं किया. विद्या भैया भी कांग्रेस छोड़कर गए पर उन्होंने किसी के खिलाफ कड़े शब्द कहे ऐसा मुझे याद नहीं. श्यामाचरण जी को तो पार्टी से एक-दो नहीं बल्कि पूरे बारह वर्षों तक अलग रहना पड़ा पर न उन्होंने कभी किसी के खिलाफ कुछ कहा और न आक्रोश ही प्रकट किया. जवाहरलाल नेहरु और सुभाष चन्द्र बोस में जीवन भर मतभेद रहे पर जवाहर लाल नेहरु मरते दम तक बोस की पत्नी एमिली शेंकेल बोस की मदद करते रहे. सुभाष चन्द्र बोस ने महात्मा गाँधी की मर्जी के खिलाफ कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा और भारी मतों से जीते भी पर गाँधी जी के सम्मान के चलते उन्होंने इस्तीफा दे दिया. मैंने उस दौर की राजनीति देखी थी और मुझे भ्रम था कि मेरी मौत के बाद भी राजनीति वैसी ही होगी पर मेरे भतीजों ने दिखा दिया कि आज की राजनीति कालिख की राजनीति है. मुझे ख़ुशी है कि मेरी मौत विमान दुर्घटना में ही हो गई थी वर्ना जो लोग मेरी मौत के बाद मेरे नाम और मेरे विचारों को मारने पर तुले हैं क्या वे जीते जी अपने लाभ के लिए मेरा गला नहीं घोंट देते ? बहरहाल जाते-जाते अपने ढाई करोड़ बच्चों को यही संदेश देना चाहती हूँ कि चाहे मेरे तथाकथित भतीजे जो भी कहें या करें पर एकता अखंडता और भाईचारे के उस पाठ को कभी मत भूलना जिसे सीखाने के लिए मैंने जीवन भर संघर्ष किया और अंत में अपने प्राणों की आहुति दे दी.
जय सतनाम.
तुम्हारी अपनी मिनी माता.

(प्रदेश व देश के विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित आलेख)

Friday, June 14, 2013

चौरासी साल के युवा थे विद्या भैया...




 - गौरव शर्मा "भारतीय"

सुकमा के दरभा घाटी में बर्बर नक्सली हमले में घायल विद्याचरण शुक्ल अंततः छत्तीसगढ़ को रोता बिलखता छोड़कर चले गए। उनके निधन के साथ ही उस स्वर्णिम युग का भी अवसान हो गया जिसमे उन्होंने 50 वर्षों से भी अधिक समय तक देश की राजनीति की दशा व दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई। चौरासी वर्ष के इस बुजुर्ग राजनेता को कभी वयोवृद्ध नहीं कहा गया। वे सदैव विद्या भैया का संबोधन ही पाते रहे। उनके साथ बुजुर्गों की भीड़ नहीं बल्कि युवाओं की फ़ौज हुआ करती थी। विद्या भैया युवाओं के प्रेरणाश्रोत रहे हैं। युवा कार्यकर्ताओं को उनके आशीर्वाद व मार्गदर्शन में अपना उज्ज्वल भविष्य नजर आया करता था। उनके हजारों समर्थकों को विश्वास था कि वे एक बार फिर छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को पुनर्जीवित कर देंगे। विद्या भैया एक ऐसे राजनेता थे जिन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में अपने साथ साथ छत्तीसगढ़ को भी स्थापित किया। नौ बार उन्होंने भारतीय संसद में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व किया। दिल्ली में रायपुर की पहचान थे विद्या भैया। इंदिरा गाँधी, पीवीनरसिम्हा राव, वीपी सिंह व चंद्रशेखर के मंत्रिमंडल में वीसी शुक्ल कई महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री रहे। एक समय उनकी गिनती देश के सर्वाधिक ताकतवर राजनेताओं में होने लगी थी। उन्हें भावी प्रधानमंत्री के रूप में भी देखा जाने लगा था। आपातकाल के समय विद्याचरण शुक्ल केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री थे। मीडिया को नियंत्रित करने व इंदिरा गाँधी के निर्देशों का अक्षरशः पालन करवाने के लिए उनके कार्यकाल को आज भी याद किया जाता है। 2 अगस्त 1929 को रायपुर में जन्में विद्याचरण शुक्ल ने नागपुर के मौरिस कालेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। राजनीति में आने से पहले उन्होंने एक शिकार कंपनी भी बनाई पर जब उनका मन इस काम में नहीं लगा तो उन्होंने अपने पिता पंडित रविशंकर शुक्ल की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए राजनीति में सक्रिय हुए और 1957 में महासमुंद लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़कर सबसे कम उम्र के सांसद बनने का गौरव हासिल किया। उनकी रूचि हमेशा राष्ट्रीय राजनीति में रही पर छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद वे प्रथम मुख्यमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार माने गए। उनके पिता मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री थे अतः उनकी भी इच्छा थी कि प्रथम मुख्यमत्री बनकर वे छत्तीसगढ़ को गढ़ सकें। एक ऐसे छत्तीसगढ़ का निर्माण कर सकें जो शांत समृद्ध व खुशहाल हो। जहाँ हर वर्ग को सामान अवसर प्राप्त हो पर उनका यह स्वप्न अधुरा ही रह गया। वे छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री नहीं बन सके। 2013 का विधानसभा चुनाव उनके लिए फिर एक अवसर लेकर आया था। विद्या भैया पूरी शिद्दत से कांग्रेस को छत्तीसगढ़ में पुनर्जीवित व स्थापित करने में जुटे थे। परिवर्तन यात्रा के प्रारंभ से सुकमा के अंतिम सभा तक वे साथ रहे। चौरासी वर्ष की उम्र में भी उनकी चुस्ती और फुर्ती देखकर युवा कार्यकर्त्ता भी अचंभित हो जाते। बावजूद तमाम परेशानियों के उनके चेहरे पर कभी तनाव नजर नहीं आया करता था। वे जब भी कार्यकर्ताओं या आम लोगों के सामने आते तो उनके चेहरे पर सहज मुस्कान होती और यही मुस्कान उनके हजारों समर्थकों में अभूतपूर्व उत्साह का संचार कर देती। लंबे राजनैतिक जीवन में उन्होंने कभी किसी पर अनर्गल आरोप नहीं लगाए। कभी किसी के दिल को ठेस पहुंचाने वाली टिपण्णी नहीं की। यही वजह है कि कांग्रेस के साथ ही अन्य राजनैतिक दलों में भी उनके मित्र थे। छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के संबंध में विद्याचरण शुक्ल का योगदान अविस्मरणीय था। उन्होंने बस्तर से लेकर सरगुजा तक यात्रा की जिसमे युवा वर्ग ने बढ़ चढ़कर भाग लिया। दिल्ली में उन्होंने अपने हजारों समर्थकों के साथ गिरफ्तारी भी दी। कई वर्षों तक वे छत्तीसगढ़ संघर्ष मोर्चा के बैनरतले राज्य निर्माण के लिए संघर्ष करते रहे। राज्य बनने के बाद जब उन्हें लगा कि जिन उद्देश्यों के लिए छत्तीसगढ़ का निर्माण किया गया था उन्हीं उद्देश्यों की अनदेखी की जा रही है तो वे विरोध करने से भी नहीं चुके। छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़िया के हित की रक्षा के लिए उन्होंने कांग्रेस का परित्याग करने से भी परहेज नहीं किया। इसीलिए आज उनके चले जाने के बाद एक छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक शून्य पैदा हो गया है। उनके हजारों समर्थक स्वयं को अनाथ महसूस कर रहे हैं। विद्याचरण शुक्ल के साथ वह स्वर्णिम दौर भी थम गया जिसके बगैर छत्तीसगढ़ के राजनीति का इतिहास अधुरा है। सच कहा जाए तो छत्तीसगढ़ की राजनीति में फिर कोई विद्या भैया पैदा होगा इसकी संभावना कम ही है।

Saturday, June 8, 2013

तोते की व्यथा...


-गौरव शर्मा "भारतीय"

मेरा नाम तोताराम है ! जी हाँ... मै वही तोताराम हूँ जो कल तक लोगों को उनका भविष्य बताया करता था। लचर प्रशासनिक तंत्र व कुछ भ्रष्ट नौकरशाहों की वजह से इन दिनों मै चर्चा में हूँ। हाल ही में देश के उच्चतम न्यायालय ने मेरी तुलना सीबीआई से कर दी है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा टिप्पणी करने के बाद ही मै चर्चा में आया हूँ। इस टिप्पणी के बाद मीडिया ने मुझे सर आँखों पर बैठा लिया। लोग मेरी तस्वीरों के साथ प्रदर्शन करने लगे। स्वार्थ के सागर में गले तक डूब चुके कुछ लोगों ने तो मेरे नाम का प्रयोग करने के लिए कापीराईट कराने की भी तैयारी कर ली है। जो भी हो पर मुझे इस टिप्पणी से गहरा आघात पहुंचा है कि मेरी तुलना सीबीआई से की गई। अब आप ही बताइए, बार बार रंग बदलने वाले सीबीआई की तुलना मुझसे करना कहाँ तक उचित है ? कभी शेर की तरह दहाड़ने तो कभी चूहे की तरह भयभीत होने वाली सीबीआई की तुलना आखिर तोते से कैसे की जा सकती है ? जब-जब देश में सरकार बदलती है, सीबीआई गिरगिट की तरह रंग बदलती है। आश्चर्य है कि सीबीआई की तुलना मुझसे की जाती है जबकि न मै अवसरवादी हूँ और न पलायनवादी। मै तो कल तक लोगों को उनका भविष्य बताया करता था। `तपतकुरु` और `राम-राम` जप कर लोगों को हर क्षण ईश्वर के करीब होने का संदेश दिया करता था। और आज... मुझे एक कथा की याद आ रही है, एक बार किसी नगर में धर्मसभा का आयोजन हुआ। उसमे भाग लेने देश भर से विद्वतजन पहुंचे। मै भी अपने विद्वान स्वामी के साथ उस सभा में पहुंचा। जब मेरे स्वामी के बोलने का समय आया तो उन्होंने मुझे सामने कर दिया और कहा कि मुझसे अधिक विद्वान मेरा तोता है, सभा में यही शास्त्रार्थ करेगा। मैंने अपने स्वामी द्वारा सिखाई गई सारी बातें सभा में उपस्थित जनों को बताई। मैंने अमन का संदेश देकर सभी को स्तब्ध कर दिया, पर अफ़सोस उस समय मीडिया नहीं हुआ करता था इसलिए उसका अटेंशन नहीं मिला। सच कहूँ तो मेरी नाराजगी उच्चतम न्यायालय से नहीं है, मै नाराज हूँ उन दो कौड़ी के नेताओं से जिन्होंने मुझे एक दूसरे को नीचा दिखाने का माध्यम बना लिया है। मै नाराज हूँ तथ्यहीन खबर दिखाने व अनर्गल प्रलाप करने वाली मीडिया से जिसे हर ऐरी गैरी बात को ब्रेकिंग न्यूज़ बनाने की आदत है। मुझे यह कहने में संकोच नहीं है कि इसी वजह से मै अब शहरों व गावों में आसानी से नजर नहीं आता। इसी वजह से मै चुपचाप पिंजरे में पड़ा राम नाम जपता रहता हूँ। भले मेरी तुलना कोई सीबीआई से करे पर मै जनता हूँ कि मैंने आज तक किसी के साथ पक्षपात नहीं किया अपने स्वामी के हितों की रक्षा के लिए कभी किसी को डराया-धमकाया नहीं। मैंने तो हमेशा प्रेम, सद्भाव, संवेदनशीलता व एकता का पैगाम दिया है। न जाने लोग क्यों मेरी तुलना सीबीआई से कर मेरा अपमान करने पर अमादा हैं। खैर... मै तो गाँधी के सिद्धांतों पर चलने वाला तुच्छ प्राणी हूँ। ईश्वर से यही प्रार्थना कर सकता हूँ कि वे लोगों को सद्बुद्धि दे। गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले सीबीआई को इतना हौसला दे कि वह भी मेरी तरह सच को सच और झूठ को झूठ कहने का सहस कर सके। आपने मेरी व्यथा-कथा को सुना इसलिए मै आप इंसानों का दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ। 

(विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित)

Friday, May 31, 2013

क्या ऐसे ख़त्म होगा नक्सलवाद...

क्या ऐसे ख़त्म होगा नक्सलवाद...


- गौरव शर्मा "भारतीय"

प्रदेश में हुए नक्सली हमले के बाद एक बार फिर आरोप-प्रत्यारोप, बैठकों व आश्वासनों का दौर प्रारंभ हो गया है। कांग्रेसी राज्य सरकार पर परिवर्तन यात्रा को पर्याप्त सुरक्षा न देने का आरोप लगा रहे हैं वहीँ मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह कांग्रेसियों को ऐसे मामले पर राजनीति न करने की सलाह दे रहे हैं। तमाम गतिविधियों के बीच नक्सलवाद के सफाए का मुद्दा एक बार फिर गौण हो गया है। राज्य सरकार सर्वदलीय बैठक व विधानसभा के वशेष सत्र के माध्यम से नक्सलवाद के खिलाफ रणनीति तय करने का प्रयास कर रही है। कांग्रेस ने इस बैठक का ही बहिष्कार कर दिया है। प्रश्न यह है कि क्या सर्वदलीय बैठक, विधानसभा का विशेष सत्र या दो चार अधिकारियों पर कार्रवाई से नक्सलवाद समाप्त होगा ? कांग्रेसी चाहते हैं कि मुख्यमंत्री इस्तीफ़ा दें, क्या उनके इस्तीफे से नक्सलवाद की समस्या समाप्त होगी या कांग्रेस के दिवंगत नेता वापस आ जाएंगे ? यक्ष प्रश्न है कि नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई के लिए और कितनी घटनाओं का इंतजार किया जा रहा है? इस हमले ने जितने प्रश्न राज्य सरकार के समक्ष खड़े किये हैं उतने ही प्रश्न केंद्र के समक्ष भी है। सबसे पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय कटघरे में खड़ा है कि नक्सल प्रभावित राज्य सरकारों के साथ समन्वित रणनीति बनाकर कार्य क्यों नहीं किया जा रहा है? हकीकत यह है कि 1967 से लेकर 2013 तक नक्सलवाद पर बातें तो खूब की गई किन्तु आज तक केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा स्पष्ट रणनीति नहीं बनाई जा सकी जिससे नक्सलवाद के खात्मे की दिशा में निरंतर प्रयास किया जा सके। नक्सलियों ने तब से लेकर अबतक स्वयं को ताकतवर बनाने की दिशा में निरंतर कार्य किया पर हमारी सरकारें कमजोर ही साबित हुईं। नक्सलवाद से लड़ाई के नाम पर आज भी तीर कमान लिए आदिवासियों की कल्पना की जाती है जबकि नक्सली रॉकेट लांचर तक बना चुके हैं। पुलिस के जवानों से अपेक्षा की जाती है कि कई साल पुराने हथियार लेकर वे एके 47 व 56 जैसे अत्याधुनिक हथियारों का सामना करें। आखिर यह कैसे संभव है? जब तक जवानों को पर्याप्त सुरक्षा उपकरण, बेहतर संवाद व्यवस्था व उनके परिजनों को संरक्षण नहीं दिया जाएगा तबतक कोई जवान आखिर कैसे नक्सलियों के सामने सीना तानकर खड़ा होने का साहस कर पाएगा। समस्या यह है कि आज भी हम पुलिस बनकर या जनप्रतिनिधि बनकर नक्सलियों से लड़ने के बारे में सोचते हैं जबकि अपराधी को पकड़ने के लिए अपराधी की तरह सोचा जाना आवश्यक है। इसी तरह अगर नक्सलियों के हौसले पस्त करना हैं तो उनकी तरह ही सोचना होगा। उनकी हरकतों पर नजर रखकर उसके मुकाबले उत्कृष्ट कार्ययोजना का निर्धारण करना होगा। उनकी भाषा, कार्यशैली व मंशा को समझना होगा। जिस तरह नक्सलियों ने बस्तर के सुदूर अंचलों तक अपना नेटवर्क स्थापित किया है, उसी तरह हमारे जवानों को भी आदिवासियों का विश्वास अर्जित करना होगा। उनसे बेहतर संवाद व तालमेल स्थापित कर अपना नेटवर्क नक्सलियों से भी मजबूत करना होगा। यह भी विचार करने की आवश्यकता है कि यह सब क्या उन जवानों व कर्मचारियों द्वारा संभव है जिन्हें सजा काटने के लिए बस्तर भेजा गया है। बस्तर को प्रदेश के सबसे संवेदनशील व कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों व कर्मचारियों की आवश्यकता है पर बस्तर का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा की वहां पदस्थ अधिकांश कर्मचारी किसी भी तरह अपने दिन काटने व अपने मन पसंद स्थान में स्थानान्तरण कराने में लगे हैं। मंत्रियों और प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा संतुष्टिजनक कार्य न करने पर कर्मचारियों को बस्तर भेजने की धमकी दी जाती है। इसका आशय यह है कि बस्तर को सेल्युलर जेल मान लिया गया है जहाँ कर्मचारियों को कालापानी की सजा के लिए भेजा जाता है। नक्सलवाद का समाधान करने की दिशा में निरंतर प्रयास का इससे बेहतर समय और नहीं हो सकता। प्रदेश ही नहीं देश की जनता भी अब चाहती है कि राम जी का ननिहाल कहलाने वाले प्रदेश में अब राम राज्य स्थापित हो। छत्तीसगढ़ में एक ऐसा राज आए कि बस्तर के आदिवासी से लेकर प्रदेश का अंतिम व्यक्ति तक शांति समृद्धि व खुशहाली के साथ मुस्कुरा सके। चारों ओर हर्ष का वातावरण निर्मित हो सके। आवश्यकता इस बात की है कि अब नक्सलवाद के उन्मूलन की दिशा में इमानदारी पूर्वक ठोस प्रयास किया जाए न कि कोरे आश्वासनों व आरोप-प्रत्यारोप में समय व्यर्थ गंवाया जाए।
(प्रदेश के विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित आलेख)

Tuesday, May 14, 2013

लो मै आ गया...

विभिन्न भाव भंगिमाओं में आपका अपना गौरव शर्मा "भारतीय"
प्रदेश के मुख्यमंत्री माननीय डॉ रमन सिंह के साथ आपका अपना गौरव शर्मा "भारतीय"


प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के साथ आपका अपना गौरव शर्मा "भारतीय"

Monday, May 13, 2013

लो मै आ गया...


वन्दे मातरम,
समस्त सम्माननीय आत्मीय जनों को आपके अपने गौरव शर्मा "भारतीय" की ओर से सादर प्रणाम, आदाब, सतश्री अकाल !! आज लगभग डेढ़ साल बाद मै ब्लॉगजगत में फिर से कदम रखा हूँ... जीवन की आपाधापी में ऐसा मशगुल हुआ कि कुछ ब्लॉग जगत से नाता ही टूट गया। मगर मेरे शुभचिंतकों व आत्मीय जनों के प्यार ने मुझे एक बार फिर ब्लॉग लिखने पर मजबूर कर दिया। अब मै आप सभी को विशवास दिलाता हूँ कि नियमित रूप से अपने संदेशों व विचारों के साथ आप सभी के बीच उपस्थित होता रहूँगा। आशा ही नहीं वरन विश्वास है कि जिस तरह पहले मुझे आप सभी ने स्नेह और आशीर्वाद प्रदान किया, निरंतर प्रदान करते रहेंगे।
- गौरव शर्मा "भारतीय"

काश! पाकिस्तान भी भारत जैसा होता..

(भारत, पाक का मिलन, आपका अपना गौरव शर्मा "भारतीय" पाकिस्तानी नागरिकों के साथ)
गौरव शर्मा 'भारतीय'
काश, मेरा जन्म भारत में हुआ होता तो मुझे इस पवित्र धरती में कदम रखने के लिए 23 साल तक इंतजार न करना पड़ता। यह कहना है पाकिस्तान से भारत आये जत्थे के सदस्य गोपाल अग्रवाल का। गोपाल कहते हैं कि भारत आकर जो ख़ुशी मिली है उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। यही वो धरती है जिसमें सारे धर्मों, जातियों व लोगों को समेटने और भरपूर प्यार करने की क्षमता है। गोपाल पाकिस्तान के सिंध प्रांत से आये हैं। उनका कहना है कि कई सालों से वे भारत आने और इस धरती को करीब से देखने के इच्छुक थे पर 23 सालों बाद उन्हें यह मौका मिला। भारतीयों से मिले मान-सम्मान व स्वागत से अभिभूत होकर वे कहते हैं, सुना तो था कि भारत में अतिथि को भगवान का दर्जा दिया जाता है यहां आकर यह देख भी लिया। विदित हो कि इन दिनों राजधानी के शदाणी दरबार में अमृतसर के वाघा बार्डर के रास्ते पाकिस्तान से 184 श्रद्धालुओं का जत्था दर्शन करने आया है। इसमें 37 महिलाएं व 8 बच्चे भी हैं। पाकिस्तान के चारों प्रांतों से आए लोग कल ही रायपुर पहुंचे हैं। यहाँ शदाणी दरबार परिसर में ही उनके ठहरने की व्यवस्था की गई है। उनकी सेवा के लिए आसपास के लोग अपने रोजमर्रा के काम को छोड़कर लगे हुए हैं। पाकिस्तानी यात्री छत्तीसगढ़ के धार्मिक स्थानों के साथ ही हरिद्वार, वैष्णव देवी, शिमला, दिल्ली व अमृतसर भी जाएंगे। 8 जून को उनकी पाकिस्तान वापसी होगी। पाकिस्तान के हालात के बारे में पूछने पर पाकिस्तानी श्रद्धालु हिचकते हुए कहते हैं कि 'सब ठीक हैÓ पर उनका दर्द उभर कर सामने आ ही जाता है। उनका कहना है कि वहां की आवाम बहुत ही अच्छी है। लोगों से कोई खतरा नहीं है मगर सियासी लोगों व कट्टरपंथी ताकतों की वजह से आज भी दंगे फसाद और उन्माद की आशंका बनी रहती है। हालांकि वे यह बताना भी नहीं भूलते की उन्हें अपनी धार्मिक रीति रिवाजों के पालन में कोई कठिनाई नहीं है। सिंध के घोटकी जिले से आए रतनलाल वंजारा कहते हैं कि वहां और यहाँ बहुत सी समानताएं हैं। पाकिस्तान की ही तरह भारत की आवाम भी अच्छी है। गौरतलब है कि पाकिस्तान में इन दिनों चुनावी सरगर्मी जोरों पर है। आज ही वहां मतदान है। चुनाव के विषय पर बात करते हुए पाकिस्तानी नागरिक कहते हैं कि इस बार कुछ कहा नहीं जा सकता पर नवाज शरीफ की पार्टी का अभी जोर है। क्रिकेट से सियासत में आए इमरान खान की पार्टी तहरीक ए इंसाफ में भी लोग अब भरोसा करने लगे हैं। उनकी पार्टी में पढ़े-लिखे व बुद्धिजीवी लोगों की बड़ी तादाद है। इस बार तहरीक ए इंसाफ भी अच्छा प्रदर्शन कर सकती है। बिलावल भुट्टो व हिना रब्बानी खार के रिश्तों की बात आने पर पाकिस्तानी नागरिक कुछ नहीं कहते पर उनकी मुस्कान सब कुछ बयान कर जाती है। बहरहाल, पाकिस्तानियों से मिलने व उनसे बात करने पर यह स्पष्ट होता है कि वे भी दोनों देशों के बीच दोस्ती व अमन के पक्षधर हैं। उनकी इच्छा है कि भारत की ही तरह पाकिस्तान में भी लोकतंत्र कायम हो और अमन का वातावरण बने। जिस तरह भारत में अल्पसंख्यक सुरक्षित हैं उसी तरह पाकिस्तान के भी हिन्दू अल्पसंख्यकों को सुरक्षा व विकास का वातावरण मिले।
स्पष्टीकरण / जानकारी के लिए कृपया संपर्क करें
कार्यालय फ़ोन
: 91-120-3025800/01/02/03
मोबाइल फ़ोन: +91-9313437447
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Sunday, January 8, 2012

हिंदी हिंद की शान है...

जय हिंद,
 समस्त आत्मीय जनों को आपके अपने गौरव शर्मा "भारतीय" की ओर से सादर प्रणाम, आदाब, सतश्री अकाल !!
,
मेरा आप सभी से एक प्रश्न है कि हम अपनी मातृभाषा हिन्दी का प्रयोग न कर किसी अन्य भाषा का प्रयोग क्यों करें  ?
मित्रों, हमें अंग्रेजी बोलने में गर्व का अनुभव होता है जबकि गर्व हमें इस बात पर होना चाहिए कि अंग्रेजी के अधिकांश शब्द हमारी प्रचिनतम भाषा, देववाणी संस्कृत से लिए गये हैं और उससे भी अधिक गर्व हमें इस बात पर होना चाहिए कि दुनिया में बोली जाने वाली लगभग 14,000 बोली, भाषा और विभाषाओँ को व्याकरण के चौदह सुत्र प्रदान करने वाले महान ब्रम्हर्षि पाणनीय "भारतीय" थे...
मेरा आप सभी से निवेदन है -
हिन्दी बोलिए.
हिन्दी लिखिए..

हिन्दी पढ़िए...
  क्योंकि हिन्दी हिन्द की शान है, क्योंकि हिन्दी भारत की पहचान है, क्योँकि हिन्दी मात्र एक भाषा नहीं है वरन हिन्दी हमारी मातृभाषा है।
जय भारत, जय अभियान भारतीय...!!

Friday, October 7, 2011

दुरी बस कुछ दिनों की...


जय हिंद, 
समस्त आत्मीय जनों को आपके अपने गौरव शर्मा "भारतीय" की ओर से सादर प्रणाम, आदाब, सतश्री अकाल !!
सर्वप्रथम देरी से माफ़ी के साथ नवरात्री विजयादशमी की बधाई स्वीकार करें, तथा दीपावली की अग्रीम बधाई भी स्वीकार करें |
किंचित व्यस्तता के चलते आजकल ब्लॉग एवं ऑरकुट से थोड़ी दुरी सी बन गयी है पर मै आप सभी आशिर्वादकों, मार्गदर्शकों एवं मित्रों से कभी भी दूर नहीं हो सकता अतः आप मुझे मेरे मोबाईल न. 09301988885 तथा 09993168799 पर कभी भी संपर्क कर सकते हैं |
आशा ही नहीं वरन विशवास है की आपका स्नेह आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन पूर्व की भांति सदैव प्राप्त होता रहेगा | 
कुछ दिनों के लिए अपने गौरव को इज़ाज़त दें...

जय हिंद, जय भारत, जय अभियान भारतीय...!!

Sunday, July 10, 2011

यह कैसा विरोध ??

समस्त आत्मीय जनों को आपके अपने गौरव शर्मा "भारतीय" की ओर से सादर नमस्कार, आदाब, सतश्री अकाल !!

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का आधार होती है और यही स्वतंत्रता एक अच्छे शासन एवं प्रशासन की नीव भी होती है अतः अभिव्यक्ति का मर्यादित एवं संयमित होना भी बेहद आवश्यक है, वर्तमान समय में भारत में अमर्यादित टिप्पणियों एवं भाषणों का जैसे दौर ही चल पड़ा है और इस आग में घी का काम कर रहे हैं पक्ष विपक्ष द्वारा प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से निर्मित राजनीतिज्ञों के काल्पनिक चित्र जो आजकल चारों ओर चर्चा का विषय बने हुए हैं | देखने में आ रहा है की फेसबुक एवं ऑरकुट जैसे सोशल नेट्वर्किंग साइट्स में नेताओं के फोटोस अपलोड किये जा रहे हैं जो की पुर्णतः काल्पनिक हैं जिन्हें भ्रष्टाचार एवं कुशाशन का विरोध दर्ज करने के उद्देश्य से ही अपलोड किये जा रहे हैं पर ये चित्र इतने अश्लील और अमर्यादित हैं की इन्हें देखकर कोई भी शर्म से लाल हो जाए | विरोध अगर मर्यादित हो, संयमित हो विश्वसनीय हो तभी वह सार्थक होता है अन्यथा उसका प्रतिकूल प्रभाव समाज एवं देश पर पड़ने लगता है आज ऐसा ही कुछ मुझे अपने देश में होता नजर आ रहा है जो घोर आपत्तिजनक है | भारत जैसे देश में जहाँ नारी की पूजा की जाती है वहां किसी भी नारी का अपमान किया जाना कहाँ तक जायज है साथ ही हम उन देशभक्तों का भी अपमान कर रहे हैं जो हमारे लिए दिनरात अनशन कर रहे हैं और जिनपर सच कहने की वजह से लाठियों भांजी जा रही हैं|
            कोई किसी के खिलाफ मर्यादाविहीन बातें कहता है तो दूसरा उससे भी असंयमित  भाषा में जवाब देता है और यह प्रक्रिया निरंतर बनी हुई है कई बात तो ऐसा प्रतीत होता है मानो मर्यादाविहीन बातों की प्रतियोगिता करायी जा रही हो | मेरा उद्देश्य किसी की आलोचना करना या समर्थन करना नहीं वरन भारतीय लोकतंत्र के मर्यादाओं को लगातार तार तार करती राजनीतिज्ञों की बोलियों एवं ऐसे मर्यादाविहीन चित्रों का प्रयोग कर विरोध दर्ज कराने की इस कुप्रथा को पोषित और पल्लवित होने से रोकना है क्योंकी हमारी संस्कार, हमारी संस्कृति और हमारी सभ्यता ही हमारी धरोहर है और अगर हम इस धरोहर की रक्षा नहीं कर सके तो निश्चित ही हमारी स्थिति अकल्पनीय होगी  अतः मै समस्त आत्मीय जनों से अनुरोध करता हूँ की जाने अनजाने में ऐसे मर्यादाविहीन चित्रों का ना प्रयोग करें और न ही इसका समर्थन करें........जय हिंद जय भारत !!

Sunday, June 12, 2011

मनोज भैया को जन्मदिन की बधाई...

समस्त आत्मीय जनों को आपके अपने गौरव शर्मा "भारतीय" की ओर से सादर नमस्कार, आदाब, सतश्री अकाल !!

                       यूँ तो मेरे लिए हर दिन खास होता है पर आज का दिन मेरे लिए और भी खास है, आज मेरे प्रेरणाश्रोत, मेरे मार्गदर्शक आदरणीय मनोज कंदोई जी का जन्मदिवस है | मनोज भैया जिनका आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन हमें हमेशा मिला करता है जिनसे हमें सकारात्मक ऊर्जा और अभूतपूर्व उत्साह की प्राप्ति होती है उन्हें आज के इस अवसर पर मै ढेर सारी बधाई एवं उनके स्वस्थ, दीर्घायु जीवन एवं उज्जवल भविष्य के लिए अशेष शुभकामनायें प्रेषित करता हूँ | वर्तमान में मनोज भैया रायपुर नगर के सर्वाधिक प्रतिष्ठित स्वामी विवेकानंद वार्ड के पार्षद एवं राजस्व विभाग नगर निगम रायपुर के अध्यक्ष हैं, आदरणीय मनोज भैया ने आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक क्षेत्रों में अपने सरल व्यवहार एवं कुशल नेतृत्व क्षमता के चलते जो लोकप्रियता हासिल की है वह वाकई काबिलेतारीफ है, विरोधी भी जिनके गुणों के कायल हैं ऐसे आदरणीय मनोज भैया अपने जादुई व्यकतित्व के चलते ही नगर के लोकप्रिय एवं प्रतिष्ठित जनप्रतिनिधियों की गिनती में अग्र पंक्ति में गिने जाते हैं |
                         वर्तमान समय में जब राजनीती और राजनीतिज्ञों पर न जाने कैसे कैसे सवाल उठ रहे हैं ऐसे समय में आदरणीय मनोज भैया ने अपने स्वच्छ छवि के माध्यम से यह साबित किया है की प्रत्येक राजनीतिज्ञ एक जैसा नहीं होता और आज भी राजनीती में स्वच्छ छवि के कर्मठ व्यक्ति मौजूद हैं जिनमे अपने नगर, अपने प्रदेश और अपने देश के लिए कार्य करने का जज्बा है | आडम्बर से कोशों दूर रहने वाले आदरणीय मनोज भैया सदैव सादगी और संजीदगी से अपना जीवन व्यतीत करते हैं, विपरीत परिस्थितयों का धैर्य के साथ सामना करने का स्वभाव वाकई उन्हें दूसरों से अलग करता है | जनता के दुःख दर्द और उनके परेशानियों को हल करने के लिए आदरणीय मनोज भैया सदैव तत्पर रहते हैं और मैंने शायद ही कभी ऐसा देखा हो की कोई भी व्यक्ति जो अपने किसी काम के लिए उनके पास गया हो और निराश होकर लौटा हो  वे हमेशा आम जनता की हरसंभव मदद के लिए तैयार रहते हैं | वर्तमान में जब राजनीती में अच्छे लोगों की कमी महसूस की जाने लगी हैं ऐसे समय में उदार ह्रदय के सरल और सुलभ राजनीतिज्ञ का होना वाकई सुखद है | 
मै पुनः इश्वर से कामना करता हूँ की आदरणीय भैया मनोज कंदोई जी को स्वस्थ, दीर्घायु जीवन एवं उज्जवल भविष्य प्रदान करें एवं आदरणीय मनोज भैया को यह विश्वास दिलाता हूँ की हर कदम पर हम आपके साथ हैं पुनः जन्मदिन की ढेर सारी बधाई एवं अशेष शुभकामनायें ..... 
बार बार दिन ये आये 
बार बार दिल ये गाये 
आप जियो हजारों साल ये मेरी है आरजू ...

Sunday, May 22, 2011

अपमान तिरंगे का............ आखिर दोषी कौन ?

समस्त आत्मीय जनों को आपके अपने गौरव शर्मा "भारतीय" की ओर से सादर प्रणाम....
                         आज बड़े दिनों के बाद आप सब के समक्ष उपस्थित होने का अवसर मिला है, देरी के लिए माफ़ी चाहता हूँ | 
{ऐसे शर्मनाक हरकतों को अंजाम देते समय कहाँ चली जाती है हमारी देशभक्ति }
             तिरंगा..........जो हमारा राष्ट्रध्वज है, हमारी आन बान और शान का प्रतिक है, किसी भी देश का राष्ट्रध्वज उस देश के मान सम्मान और अस्मिता का प्रतिक होता है,  वह केवल ध्वज नहीं वरन देशवासियों के भावनाओं की अभिव्यक्ति होती है | पर बाअफ़सोस मुझे आज कहना पड़ रहा है की हम उसी तिरंगे के सम्मान करने के लायक नहीं रह गए हैं, हमारी देशभक्ति की भावना केवल राष्ट्रीय पर्वों में ही जागृत होती है और हम बड़े शान से तिरंगे से अपने चौक चौराहे और नगर को पाट देते हैं और राष्ट्रीय पर्वों के बाद..........हमारी देशभक्ति, हमारी राष्ट्रीयता की भावना न जाने कहाँ गुम हो जाती है और हम गाहे बगाहे उसी तिरंगे का अपमान करते फिरते है जिसे हमने ही बड़े शान से लगाया है |
{जरा सोचिये क्या वाकई हम "भारतीय" कहलाने के लायक है ?}
              समस्त आत्मीय जनों को मै बताना चाहता हूँ यह तस्वीर कल मैंने अपने नगर रायपुर के एक प्रतिष्ठित माने जाने वाले इलाके से ली है जहाँ मुक्कड़ पर भारत के राष्ट्रध्वज को बड़ी संख्या में आपत्तिजनक स्थिति में डाल दिया गया था | इसकी सुचना जब हमने खबर छत्तीसी ब्लॉग न्यूज़ {http://khabarchhattisi.blogspot.com/} एवं स्थानीय प्रशासन को दी तो उन्होंने इसे बड़ी तत्परता के साथ मुक्कड़ से उठाया | मै स्थानीय पार्षद महोदय एवं नगर निगम के अधिकारीयों को इसके लिए साधुवाद देता हूँ | प्रश्न यह है की आखिर राष्ट्रध्वज को मुक्कड़ में डालने का घिनौना हरकत कोई भी व्यक्ति कर कैसे सकता है ? क्या हमारी देशभक्ति मर गयी है या हमारी आस्था अब भारत में नहीं रह गयी है ? ऐसी तस्वीरें आजकल कमोबेश हर जगह आसानी से देखी जा सकती है |
                  जाने अनजाने में तिरंगे का अपमान हो रहा है कोई राष्ट्र ध्वज को मुक्कड़ में फेक रहा है तो कोई तिरंगे वाला केक काट रहा है | हमें इस बात पर अवश्य विचार करना चाहिए की आखिर ऐसा होता क्यों है ? आखिर क्यों हम राष्ट्र ध्वज को व्यवसाय का रूप देने में लगे हुए हैं ? मेरा शाशन प्रशासन में बैठे जिम्मेदार लोगों से यह प्रश्न है की आखिर क्यों हम कागज और झिल्लियों में बने तिरंगे पर पूर्ण प्रतिबन्ध नहीं लगाते जिससे इस प्रकार राष्ट्र ध्वज के अपमान को रोका जा सके ? साथ ही मै आम जन से भी विनम्र अपील करना चाहता हूँ की "मित्रों, तिरंगा हमारी आन बान और शान है और इसका स्थान सबसे ऊंचा ही अभीष्ट है. बेशक हम इसका इस्तेमाल गर्व से करें यह हमारा अधिकार है. लेकिन इसे इसे गर्व के साथ रखें भी, क्योंकि यही हमारा कर्तब्य है."
जयहिंद

Saturday, April 23, 2011

पर हमने भारत को क्या दिया....?

समस्त आत्मीय जनों को आपके अपने गौरव शर्मा "भारतीय" के ओर से सादर प्रणाम !!
                       विगत दिनों मेरी बातचीत "भारत" एवं "भारतीयता" के विषय में नेट पर मित्रों से हो रही थी तभी एक मित्र ने मुझसे कहा यार जब देखो तुम केवल देश की ही बातें किया करते हो आखिर इस देश ने हमें दिया ही क्या है ? मित्र की इस बात को सुनकर मुझे तो ऐसा लगा मानो काटो तो खून नहीं, मै उचित जवाब उन्हें दे पाता इससे पहले ही किंचित कारणों से उनसे मेरी वार्तालाप बंद हो गयी | आज मन में विचार आया की न केवल उस परम मित्र को वरन ऐसा ही सोच रखने वाले लोगों को भी बताया जाये की भारत ने हमें क्या दिया है |
                      "भारत" जो "भाष" अर्थात प्रकाश की साधना में रत है, "भारत" जो न केवल भूमि का एक टुकड़ा है, "भारत" जो न केवल लोगों का एक समूह है,  "भारत" जो न केवल नदियों का संगम है, "भारत" जो न केवल एक राष्ट्र है वरन "भारत" हमारी आत्मा है, "भारत" हमारी भावना है, "भारत" हमारा प्राण है, "भारत" हमारी संस्कृति है, "भारत" हमारा संस्कार है, "भारत" हमारी आस्था, हमारी श्रद्धा, हमारी अस्मिता का प्रतिक है, "भारत" जो देश है अर्पण का,  "भारत" जो देश है तर्पण का, "भारत" जो देश है समर्पण का, "भारत" जो न केवल हमारा अभिमान है वरन "भारत" हर भारतीय की पहचान है,  "भारत" जो अनूठी संस्कृतियों का अनुपम मेल है, "भारत" जहाँ दो कोष में भाषा बदल जाती है और चार कोष में वेशभूषा बदल जाती है मगर फिर भी अनेकता में एकता की भारत से बढ़कर कोई मिशाल नहीं है, "भारत" वह देश जहाँ भगत सिंह फांसी के तख्ते को देश की आजादी के लिए हँसते हँसते चूम लेते हैं, "भारत" वो देश जहाँ चंद्रशेखर आज़ाद देश की अस्मिता के रक्षा के लिए आखिरी गोली खुद पर ही चला लेते हैं, "भारत" जहाँ जन्म लेना ही असीम गौरव का विषय है और ऐसे महान देश के विषय में आज हम कहते हैं की भारत ने हमें क्या दिया ? 
                            मित्रों आज हम यह प्रश्न करने के लिए भी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, हमें ज्ञात होना चाहिए की विश्व में बोली जाने वाली लगभग चौदह हजार बोली, भाषा, और विभाषाओं को व्याकरण के चौदह सूत्र प्रदान किया महान ऋषि पाणनिय ने, जो "भारतीय" थे,  "भारत" जिसने धर्म और आध्यात्म के क्षेत्र में सम्पूर्ण विश्व को राह दिखाया है, विवेकानंद "भारतीय" थे जिन्होंने विश्व को धर्म की नवीन परिभाषा प्रदान की, शुन्य जिसकी खोज भारत से हुई जिसके बदौलत हमारा आज चाँद सितारों पर जाना मुमकिन हो पाया है याद करें आर्यभट "भारतीय" थे,  सत्य और अहिंसा की राह पर चलने का मार्ग जिन्होंने दुनिया के लिए प्रशस्त किया वे गाँधी जी "भारतीय" थे,  स्वास्थ्य एवं चिकत्सा के क्षेत्र में सर्वप्रथम पहल कर दुनिया को राह दिखाने वाले महान विद्वान धन्वन्तरी और चरक "भारतीय" थे |
                        मित्रों भारत के योगदान के विषय में हम जितना लिखें, जितना पढ़ें, जितना जानें, भारत के योगदान का जितना बखान करें वह कम है क्योंकि भारत विश्वगुरु के पद पर सदैव आसीन रहा है और गुरु का ज्ञान सदैव असीमित होता है, अपार होता है | पर अगर कोई व्यक्ति अपने गुरु को संदेह की दृष्टि से देखता है, उसकी क्षमताओं पर शक करता है तो मेरा मानना है की वह अपने विकास को अवरुद्ध करने की ओर पहला कदम रखता है और पतन की ओर अग्रसर होता है, हम कदापि ऐसा कृत्य न करें | बड़ा दुःख होता है जब कोई इस प्रकार का प्रश्न करता है की भारत ने हमें क्या दिया वह भी अगर देश का कोई भावी कर्णधार, कोई युवा कहता है तो वाकई बेहद पीड़ा होती है | ऐसे बेतुके प्रश्न करने वाले यह क्यों नहीं सोचते की "हमने भारत को क्या दिया है" अधिकार तो हमें याद रहता है पर अपने कर्तव्य हम भूल जाते हैं | जाने अनजाने में ही हम अपने देश अपने मातृभूमि का अपमान करते हैं और गर्व से अपने को "भारतीय" कहते फिरते हैं | जरा सोचिये क्या हम वाकई "भारतीय" कहलाने के लायक भी हैं ? मित्रों मेरी नजर में तो "भारतीय" वही है जो "भारत" को जानता है, "भारत" को पहचानता है और "भारत" को मानता है |      
                                               ***जय  हिंद जय भारत***               

Saturday, April 16, 2011

भारत रत्न कौन........?

 समस्त आत्मीय जन गौरव का सादर अभिवादन स्वीकार करें|
{सभी चित्र गूगल से साभार}
                   
            "भारत रत्न" देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान, जिसे प्राप्त करने की इच्छा हर भारतीय के दिल में होती है | पिछले कुछ दिनों से विभिन्न स्तरों पर विभिन्न व्यक्तियों एवं संस्थाओ के द्वारा लगातार यह मांग की जा रही है की क्रिकेट के बेताज बादशाह सचिन तेंडुलकर{आजकल इन्हें क्रिकेट के भगवान् भी कहा जाने लगा है}को शीघ्रातिशीघ्र "भारत रत्न" सम्मान प्रदान किया जाये और इस मांग पर शाशन के द्वारा भी गंभीरता से विचार किया जा रहा है | बेशक यह मांग जायज है और निश्चित रूप से सचिन तेंडुलकर इस सम्मान के हकदार भी हैं | उन्होंने जिस प्रकार अपने खेल जीवन में देश के लिए खेलते हुए जितनी उपलब्धियां हासिल की हैं तथा क्रिकेट जगत के अधिकाधिक रिकार्ड अपने नाम किये हैं वह वाकई प्रसंसनीय है | पर क्या हमें सचिन के अतिरिक्त "भारत रत्न" सम्मान हेतु अन्य नामों पर विचार नहीं किया जाना चाहिए ? क्या सचिन से पहले भारत के अन्य विभूतियों को इस सम्मान से नहीं नवाजा जाना चाहिए ? बेशक सचिन को "भारत रत्न" सम्मान दिया जाना चाहिए परन्तु सचिन तेंडुलकर से पूर्व "भारत रत्न" माँ भारती के उन सपूतों को प्रदान किया जाना चाहिए जिन्होंने देश के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर माँ भारती के चरणों में प्राण त्याग दिए |
                           मित्रों जरा विचार कीजिये क्या "भारत रत्न" सम्मान पर पहला अधिकार उस शहीद भगत सिंह का नहीं है जिन्होंने सम्पूर्ण भारत वर्ष को क्रांति की नविन परिभाषा दी जिन्होंने फांसी के फंदे को ख़ुशी ख़ुशी चूमकर देश के लाखों करोड़ों नौजवानों को देशभक्ति का पाठ पढ़ा दिया ?  जरा सोचिये क्या "भारत रत्न" सम्मान पहले भगत सिंह को दिया जाना चाहिए अथवा किसी अन्य को, आज़ादी के इतने वर्षों तक क्यों हम माँ भारती के वीर सपूतों को यह सम्मान नहीं दे पाए उल्टा आजकल कुछ राजनीतिज्ञों द्वारा इन शहीदों की जातियों पर पर तरह तरह की बातें की जाने लगी है जरा सोचिये क्या यह न्यायोचित है ?
                 नेताजी शुभाष चन्द्र बोस को "भारत रत्न" सम्मान देने हेतु भारत की जनता द्वारा क्या मांग नहीं की गयी फिर क्यों नेताजी आजतक इस सम्मान से वंचित हैं ? क्या इस सम्मान पर उनका अधिकार पहले नहीं है ?  माँ भारती के इन वीर सपूतों के प्रति हमारा इतना उदासीन रुख क्यों ? बेशक हमारे शहीद किसी सम्मान के मोहताज़ नहीं पर क्या शाशन, प्रशाशन का यह कर्त्तव्य नहीं की इन शहीदों को सर्वप्रथम देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया जाये | निश्चित रूप से शाशन प्रशासन की इस लापरवाही में हम भी उतने ही जिम्मेदार हैं, आज जितने शिद्दत से हम सचिन तेंडुलकर या अन्य किसी के लिए "भारत रत्न" की  मांग करते हैं क्या हमने अपने इन वीर शहीदों के लिए ऐसा किया है ?
                           मेरा उद्देश्य किसी का विरोध करना अथवा समर्थन करना नहीं वरन उन लोगों का ध्यान इन महान विभूतियों की ओर आकृष्ट करना है जिन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान "भारत रत्न" हेतु केवल एक ही नाम याद रहता है | ये मेरी भावनाएं हैं जिन्हें मैंने आपके समक्छ अभिव्यक्त किया है और मै समस्त आत्मीय जनों से इसपर उनके विचार सादर आमंत्रित करता हूँ |
                                                        ***जय हिंद जय भारत***

Thursday, April 7, 2011

आखिर कब तक ?

                                               जन्म के बाद जन्म प्रमाणपत्र के लिए रिश्वत 

                                     किसी अच्छे स्कूल में बच्चे को भर्ती करने के लिए रिश्वत 

                                                            नौकरी के लिए रिश्वत 

                                                           प्रमोशन के लिए रिश्वत 
                                    छोटे मोटे कामों के लिए जीवन भर अनगिनत रिश्वत 

                                 बुढ़ापे में सरकारी अस्पताल में इलाज़ कराने के लिए रिश्वत  

                                        मरने के बाद मृत्यु प्रमाणपत्र के लिए रिश्वत 
                                                                    
                 एक आम भारतीय की जिन्दगी में यही होता है, हर कदम पर रिश्वत देना पड़ता है | विदेशों में भी रिश्वत लिए जाते हैं, वहां भी भष्टाचार होते हैं, पर गलत कार्य करने के लिए और हमारे भारत में कार्य करने के लिए अर्थात कर्तव्यपालन के लिए भी रिश्वत लिए जाते हैं | नगर निगम और ग्राम पंचायत से लेकर संसद भवन तक भष्टाचार में शामिल है | देश का दुर्भाग्य है की देश के सबसे इमानदार कहे जाने वाले प्रधानमंत्री के नेतृत्व में देश का सबसे भ्रष्ट सरकार संचालित है | आज अनायाश एक शायर की एक पंक्ति याद आ रही है :-  "आज उन्ही के आशियाँ ए बागबां तुने उजाड़े हैं की जिनका लहू तक शामिल है तामीर ए गुलिश्तां में" भारत माता को किसी और ने नहीं उन्ही के सपूतों ने लुटा है और ऐसे लोगों पर कार्यवाही होना तो दूर वही लोग आज देश के कर्णधार बने बैठे हैं |
                  मै देश का एक आम नागरिक हूँ और मुझे भी यदाकदा इस प्रकार के भष्टाचार का सामना करना पड़ता है पर आखिर कब तक ? कब तक हम मौन होकर भष्टाचार को सहते रहें ? अब वक्त आ गया है, भष्टाचार के खिलाफ लड़ने का, एकजुट होने का, आम जनता की शक्ति को प्रदर्शित कर भ्रष्ट लोगों को सबक सिखाने का |
                   मै तो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में अन्ना हजारे और देश के करोड़ों लोगों के साथ हूँ और आप.....

Tuesday, March 15, 2011

अच्छी कैरियर की सार्थकता

समस्त आत्मीय जन गौरव का सादर  अभिवादन स्वीकार करें !!
                          आज मेरी मुलाकात बारहवीं की परीछा देकर विद्यालय  से बाहर आते कुछ छात्रों से हुयी | सभी अपने उत्तर और परीछा के विषय में आपस में चर्चा कर रहे थे, किसी का कहना था इस बार सरल प्रश्न आये थे तो कोई अपने पढ़े हुए प्रश्नों के न आने से उदास था कुल मिलकर माहौल खुशनुमा था | तभी एक समूह में खड़े छात्रों ने अपने भविष्य की योजनाओं पर वार्तालाप प्रारंभ किया | किसी ने कहा मुझे आयकर सलाहकार बनना है तो कोई इंजीनियरिंग करना चाहता था, किसी का कहना था की मुझे तो डॉक्टर ही बनना है | इसी बीच एक छात्र ने गौरवपूर्ण उत्साह के साथ कहा की मुझे तो सेना में जाना है, मै भारतीय सेना में जाकर देश की सेवा करना चाहता हूँ !! बस उस छात्र के इतना कहते ही बाकि सभी छात्र उसपर टूट पड़े और कहने लगे ये तू क्या कह रहा है यार, ये सेना वेना में जाने से क्या फायदा, उसे बिच में ही रोककर दूसरा बोल उठा तू कोई अच्छा काम करने की सोच यार वैसे भी आजकल फौजियों की पहले जैसी इज्जत भी नहीं रही कहीं कोई सैनिक शहीद हो जाता है तो न्यूज़ चैनल वाले उसका नाम तक नहीं देते सिर्फ एक बार हेड लाइन आता है "कश्मीर में ४ जवान शहीद" कहाँ घर परिवार, ऐशोआराम छोड़कर दूर अकेला जीवन बिताएगा ऊपर से इस काम में खतरा भी बहुत है कहीं कुछ अनहोनी हो गयी तो जीवन भर का दर्द अलग..........!! तू अपने पैर में कुल्हाड़ी मत मार कोई अच्छी सी प्रोफैशनल कोर्स करके अच्छा सा जॉब कर और अपना कैरियर बना, इन सबमे कुछ नहीं रखा है | तभी माहौल में कुछ ख़ामोशी और भारीपन सा छा गया और सभी मिलते रहने के वादे के साथ अपने अपने घरों की ओर चल पड़े | 
                           मैंने जब से उन युवा साथियों की बातें सुनी उनके विचार जाना तभी से मन में यही सवाल बार बार आ रहा है की क्या देश की सेवा करने से भी अच्छी कोई जॉब हो सकती है ? क्या अब हमारे लिए अच्छा कैरियर और अच्छी इनकम सबकुछ और देश गौण हो गया है ? क्या वाकई में आजकल फौजियों की कोई इज्जत नहीं रह गयी है ? क्या भगत सिंह और आज़ाद के देश के जवान अब अपने देश के लिए शहादत देने से डरने लगे हैं ? मन में और भी कई सवाल आने लगे हैं कि क्यों ? आखिर ऐसा क्यों ?
                           जब मै जवाब तलाशने की कोशिश करता हूँ तो यहाँ पर भी अपना ही दोष नजर आने लगता है | उन युवाओं की बातें कमोबेश सच ही तो थीं, आखिर कितना सम्मान देते हैं हम अपने सैनिकों को, अपने शहीदों को और उनके परिजनों को ? क्या अंजाम होता है शहादत ? अरे हम तो उन शहीदों की ताबूतों में भी धोटाले करने से भी बाज नहीं आते जिन्होंने देश के लिए अपने प्राण हँसते हँसते कुबान कर दिए और अब तो हमारे राजनीतिज्ञ शहीदों की शहादत पर भी राजनीती की रोटी सेंकने लगे हैं | इतना ही नहीं हम शहीदों के परिजनों को रोता बिलखता छोड़ देते हैं और यह जानने की कोशिश भी नहीं करते की उनके पास दो वक्त की रोटी भी है या नहीं |
                             मुझे मेरे सवालों के जवाब मिल गए, नहीं भी मिले हैं तो मिल जायेंगे |  पर अगर यही हाल रहा तो अच्छी इनकम और अच्छे कैरियर की लालच में हमारे युवा विदेशों में बसने लग जायेंगे और हम बस उनकी राह तांकते रह जायेंगे | मै अपने युवा साथियों से भी यह कहना चाहता हूँ कि क्या हमारे लिए पैसा ही सबकुछ है ? क्या अच्छी नौकरी, अच्छा व्यापार करना और सफल होना ही हमारा एकमात्र उद्देश्य है ? क्या हमारे लिए अपनी मर्तुभूमि अपने वतन अपने भारत की कोई कीमत नहीं ? आखिर क्यों हम कतराते हैं देश के लिए अपना योगदान देने में ? मेरे कहने का अर्थ यह बिलकुल नहीं है की हमसब सेना में भर्ती हो जाएँ | पर हम देश के विकास की मुख्यधारा से जुड़कर अपने सामर्थ्य के अनुरूप योगदान तो दे ही सकते हैं और हमें यह भी विचार करना चाहिए की अगर आज हम पलायनवादी रुख अपनाते हैं तो जरा सोचिये क्या हमारी आने वाली पीढ़ी क्या हमें माफ़ कर पायेगी और उस आखिर उस कैरियर की सार्थकता क्या होगी जिसे हमने देश, समाज, परिवार की कीमत चुकाकर प्राप्त किया होगा ?
                                                             जय हिंद जय भारत 
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