Monday, February 14, 2011

वेलेंटाइन डे और युवा ...

ससस्त आत्मीय जनों को आपके अपने गौरव शर्मा की ओर से सादर प्रणाम !!
{चित्र गूगल से साभार}
                    युवा किसी भी राष्ट्र की शक्ति होते हैं और विशेषकर भारत जैसे महान राष्ट्र की उर्जा तो युवाओं में ही निहित है अतः राष्ट्रीय परिदृश्य में युवाओं की भूमिका स्वतः सिद्ध है, पर जब वही युवा पाश्चात्य सभ्यता के अन्धानुकरण के फेर में देश की संस्कृति, सभ्यता और अपने राष्ट्रीय कर्तव्यों से दूर होकर वेलेंटाइन डे, फ्रेंडशिप डे जैसे और भी न जाने ऐसे कितने बेतुके तथाकथित दिवस को बड़े उत्साह के साथ मनाते नजर आते हैं और उन्ही युवाओं को जब राष्ट्रीय महत्त्व के दिन भी याद नहीं रहते तो मन में यह सवाल अवश्य आता है कि आखिर हमारे युवा कहाँ जा रहे हैं ? और कहाँ जा रहा है हमारा देश ? कैसे हम इन पथभ्रष्ट युवाओं को अपनी शक्ति अपनी ,उर्जा का श्रोत मान सकते हैं और कैसे  इनके बल पर देश के विकास का स्वप्न देख सकते हैं ? निश्चित रूप से हम सभी को इस विषय में गंभीरता से विचार करना होगा अन्यथा स्थिति अकल्पनीय होगी |
{चित्र गूगल से साभार}
                   हम अगर अपने इतिहास में जाएँ तो इस बात का कहीं कोई प्रमाण नहीं मिलता की श्री कृष्ण ने सुदामा जी को "हैप्पी फ्रेंडशिप डे" कहा हो या राधा जी को "हैप्पी वेलेंटाइन डे" कहा हो पर आज संसार में श्री कृष्ण और सुदामा जी की दोस्ती और राधाकृष्ण का प्रेम आदर्श माना जाता है |  कहने का तात्पर्य यह है की प्रेमाभिव्यक्ति अथवा भावाभिव्यक्ति हेतु किसी नियत तिथि या दिवस की आवश्यकता नहीं होती, आवश्यकता होती है तो केवल रिश्तों में मिठास की और ह्रदय में अपनापन की, आत्मीयता की जिसे अभिव्यक्त करने के लिए हम किसी तिथि  के मोहताज नहीं | कहना आवश्यक है विदेशों में रिश्तों में अपनापन और आत्मीयता गौण है पर फिर भी उनके लिए इसे प्रदर्शित करना आवश्यक होता है | वे आज एक व्यक्ति के साथ अगर वेलेंटाइन डे मना रहे हैं तो आवश्यक नहीं की आगामी डे भी इसी व्यक्ति के साथ मना सकेंगे और हमारे देश में रिश्ते जन्म जन्मान्तर तक निभाए जाते हैं क्योंकी हमारे रिश्ते खोखले नहीं हैं, उनमे संवेदनशीलता है, विश्वास है, अपनापन है, आत्मीयता है | विदेशों में मदर्स डे, फादर्स डे का भी प्रचलन है क्योंकी वहां संयुक्त परिवार की प्रथा नहीं एकल परिवार की प्रथा प्रचलित है एक निश्चित समय के उपरांत माँ बाप अपने बेटों से और बेटे अपने माँ बाप से अलग जीवन व्यतीत करते हैं अतः वे एक दिन अपने माता पिता के प्रति प्रेम अथवा सम्मान की भावना को प्रदर्शित करते हैं जबकि हमारे देश में श्रवण कुमार और श्री राम जी जैसे पुत्र होते हैं जिन्हें अपनी भावनाओं को प्रदर्शित करने की कतई आवश्कता नहीं होती |
                    वर्तमान समय की आवश्कता है की हम पाश्चात्य संकृति के अन्धानुकरण को त्यागकर अपने संस्कार, अपनी संस्कृति को आत्मसात करें तथा अपने भारत को पतन की ओर अग्रसर होने से रोकें यही हमारा कर्त्तव्य है | मै स्वयं युवा हूँ और मेरा उद्देश्य युवा वर्ग को कटघरे में खड़ा करना नहीं वरन उन्हें गलत राश्तों पर जाने से रोकना है उन्हें देश के विकास की मुख्यधारा से जोड़कर राष्ट्रहित में समुचित योगदान देने हेतु प्रेरित करना है |
                                                            जय हिंद जय भारत

Wednesday, February 9, 2011

माया की यह कैसी माया ...

{चित्र गूगल से साभार}

वन्दे मातरम, समत आत्मीय जन आपके अपने गौरव का सादर अभिवादन स्वीकार करें !!
                      राजनीति और चाटुकारिता का चोली दामन का साथ सर्वविदित है | राजनीती और राजनीतिज्ञों में चाटुकारिता हमेशा से  महत्वपूर्ण स्थान पर रही है पर एक निश्चित सीमा तक यह सिमित रहे तो सहनीय हो सकता है पर कभी कभी पानी सर से ऊपर हो जाता है जिसके परिणाम घातक और अकल्पनीय होते हैं | जीवित व्यक्ति की मूर्ति और नोटों की माला तक तो सब कुछ ठीक ठाक था पर आज एक नया मामला सामने आया है, अपनी चरण पादुका को एक उच्चाधिकारी से साफ़ कराने का, और इस पर भी हद तो तब हो गयी जब मैडम माया की इस माया को भी बड़ी बेबाकी या बेशर्मी के साथ "सामान्य घटना" निरुपित किया जाने लगा |  यह विचारणीय है की कब तक हम मूकदर्शक बने ऐसी स्थिति का सामना करते रहेंगे और कब तक हमारे ये तथाकथित नेता इस प्रकार की हरकतों को अंजाम देते रहेंगे | जो व्यक्ति अपना ध्यान स्वयं नहीं रख सकते उससे हम कैसे यह उम्मीद करते हैं कि वे हमारे प्रदेश, हमारे देश, हमारी गरीब जनता, हमारे ऐतिहासिक पौराणिक धरोहरों का ध्यान रखेंगे, क्या उनसे विकास की अपेक्छा करना हमारी कमजोरी, हमारी लाचारी का परिचायक नहीं है ? इन प्रश्नों पर आज देश के प्रत्येक नागरिक को विचार करने की आवश्यकता है मुझे यह कहने में कतई संकोच नहीं कि न केवल विचार करने की वरन उचित निर्णय लेने की भी आवश्यकता है |

{चित्र गूगल से साभार}
                        हम लोकतान्त्रिक देश के बाशिंदे हैं हमारी आस्था लोकतंत्र में है और सदा रहेगी पर इसका यह अर्थ कतई नहीं है की हम असत्य का, अधर्म का, अन्याय का विरोध नहीं कर सकते | देश की वर्तमान परिदृश्य की आवश्यकता के अनुरूप प्रत्येक नागरिक को अब जागरूक होना होगा और अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाना होगा क्योंकि केवल नेताओं के बारे में टिपण्णी करने, उन्हें और उनकी नीतियों को भला बुरा कहने से स्थितियों में परिवर्तन की आशा करना व्यर्थ है | अब हमें स्वयं के विकास के साथ ही देश के विकास के विषय में भी चिंतन करना होगा और ऐसे नेताओं को हमें मुहतोड़ जवाब देना होगा, अपने सबसे प्रभावी हथियार का सार्थक उपयोग ही हमारा जवाब होगा और हमारा यह प्रभावी हथियार है हमारा वोट | हमें संकल्प लेना होगा की अपने वोट का अपने मत का सदुपयोग कर हम ऐसे घृणित कृत्यों को अंजाम देने वाले नेताओं को कभी सत्तासीन नहीं होने देंगे | मै यहाँ यह स्पष्ट अवश्य करना चाहूँगा की मेरा उद्देश्य किसी राजनैतिक दल अथवा राजनीतिज्ञ का विरोध करना नहीं वरन देश की जनता विशेषकर राष्ट्र शक्ति युवा वर्ग को जागरूक कर उनसे राष्ट्र के विकास की मुख्य धारा में शामिल होने की अपील करना है |
                           जय हिंद जय भारत 

Tuesday, January 25, 2011


 वन्दे मातरम,
आज गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर मै आपका अपना गौरव शर्मा "भारतीय" समस्त आत्मीय जनों को हार्दिक बधाई एवं अशेष शुभकामनायें सादर प्रेषित करता हूँ | 
आज देश की राजनैतिक परिस्थितियों को देखकर मन बेहद खिन्न है | देश में राष्ट्रीय ध्वज फहराने के नाम पर जो राजनीति की जा रही है वह घृणित है, निंदनीय है | अगर कोई व्यक्ति या संगठन देश के किसी भाग में राष्ट्रीय ध्वज फहराना चाहता है तो इसमें क्या आपत्ति है ? क्या अब राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए या राष्ट्र गान गाने के लिए भी हमें उमर अब्दुल्ला की अनुमति लेनी होगी ? 
            मै किसी व्यक्ति अथवा राजनैतिक दल का समर्थन या विरोध कदापि नहीं करना चाहता पर एक आम भारतीय होने के नाते यह अवश्य कहना चाहता हूँ की अगर ऐसी परिस्थिति में भी हम एक जुट न हुए, हर भेदभाव, हर बंधन को त्यागकर केवल "भारतीय" बनकर "भारतीयता" के एकमात्र सूत्र में बंधकर देश के तथाकथित कर्णधारों को मुहतोड़ जवाब नहीं दिए तो आने वाला समय हमारे लिए अकल्पनीय होगा | 
            आज की परिस्थिति में यह बेहद आवश्यक है की हम दृढ संकल्पित होकर देश के विकास की मुख्यधारा से जुड़कर अपना योगदान देश के विकास में प्रदान करें एवं अपने महान भारत वर्ष  को "विश्वगुरु" के स्थान पर पुनः प्रतिष्ठित करें | मुझ अकिंचन की और से पुनः गणतंत्र दिवस के पवन अवसर पर हादिक बधाई एवं अनंत शुभकामनायें स्वीकार करें |
                                    जय हिंद, जय भारत

Wednesday, January 19, 2011

उठो जागो और आगे बढ़ो

               समस्त आत्मीय जन मुझ अकिंचन की ओर से शत शत वंदन एवं नववर्ष की अशेष शुभकामनायें स्वीकार करें | आजकल  देश की स्थिति को देखकर मन बड़ा खिन्न है | भय, भूख, भ्रष्टाचार और महंगाई सर्वत्र विराजमान है जनता त्राहिमाम त्राहिमाम कर कराह रही है और देश के कर्णधार भी अपनी डफली अपना राग की तर्ज पर नित्य नयी बात कर देश की जनता को बरगलाने में बड़े तन्मयता के साथ लगे हैं | रोज अख़बारों में महंगाई बढ़ने का एक नया कारण सामने आने लगा है कोई कहता है की गठबंधन धर्म निभाने के चक्कर में महंगाई बढ़ी है तो किसी का कहना है की किसान विभिन्न वस्तुओं की कीमत स्वयं तय करता है अतः "मंत्री एवं मंत्रालय" का इस पर कोई नियंत्रण नहीं है इस मामले में हद तो तब हो गयी जब महंगाई की मार से ग्रस्त और त्रस्त हो चुकी जनता को सरकार के एक नुमाइंदे ने ये सुझाव दे दिया कि सस्ता खाकर महंगाई से निपटा जा सकता है अब सवाल यह है की क्या केवल खाने से ही महंगाई से निपटा जा सकता है ? निश्चित रूप से यह बात विचार करने पर सत्य ही लगता है की कम खाने या सस्ता खाने से महंगाई की समस्या ख़त्म हो सकती है पर यह बात जनता के लिए नहीं बल्कि उनके लिए लागु होती है जो इस प्रकार की बेतुकी बात करते हैं वाकई वे लोग अगर "खाना"(रिश्वतखोरी) बंद कर दें तो समस्या ख़त्म हो न हो पर कम तो अवश्य हो जाएगी | सर्व विदित है कि हमारे देश की गरीब जनता प्याज़ और रोटी खाकर ही गुजरा करती है  पर दुर्भाग्य से उसी प्याज़ ने आज लोगों कि आँखों में आँशु ला दिया है | बाजारों में वर्ग संघर्ष स्पष्ट दृष्टिगत होने लगा है आजकल लोग प्याज़ और महँगी सब्जियां अपना रुतबा दिखने के लिए खरीदने लगे हैं और उन्हें देखकर गरीब बेचारा अपने किस्मत को कोसने लगता है |
                           पेट्रोल और डीज़ल के बढ़ते दामों ने तो सारे हदों को पार कर दिया है और इसीलिए आजकल अच्छे अच्छे लोग "पैदल" नजर आने लगे हैं कुछ बुद्धिजीवियों के द्वारा बाकायदा सायकल को "राष्ट्रीय सवारी" घोषित करने की मांग भी जोर शोर से प्रारंभ की जा चुकी है | निश्चित रूप से यह मांग जायज़ भी है क्योंकि अब पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों पर सरकार का नियंत्रण तो रहा नहीं ऐसी स्थिति में क्या भरोसा कल को दाम 100 रूपये प्रति लीटर या उससे भी अधिक कर दिए जाएँ, भुगतना तो आखिर जनता को ही है देश के तथाकथित खास लोगों को तो इंधन "फ़ोकट" में मिलता है | वाकई आज देश की हालत को देखकर रोना आता है और तथाकथित कर्णधारों पर गुस्सा, कितनी विषमता है हमारे देश में जहाँ एक ओर करोड़ों अरबों के घोटाले हो रहे हैं वहीँ दूसरी ओर ऐसे भी लोग हैं जिन्हें दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती | आज यह तय कर पाना मुस्किल हो गया है की सरकार का काम क्या है ? केवल भष्टाचार में लिप्त रहना या एक के बाद एक गलत निर्णय लेना ही सरकार की प्राथमिकता है वह भी तब जब सरकार की कमान एक बेहद पाक साफ़ छवि के विद्वान अर्थशास्त्री के हाथों में है न जाने कोई और प्रधानमंत्री होता तो देश की स्थिति शायद इससे भी दयनीय हो जाती |
                             बर्बाद गुलिस्तां करने को तो एक ही उल्लू काफी था
                             हर साख पे उल्लू बैठा है अंजामे गुलिस्तां क्या होगा                                                                     यह भी गौरतलब है की आदर्श हाऊसिंग सोसाइटी को तीन माह के भीतर तोड़ने का आदेश भी दे दिया गया है क्योंकि इसका निर्माण पर्यावरण सम्बन्धी नियमों को ताक में रखकर किया गया | विचारणीय है की उस समय जब इसका निर्माण किया जा रहा था तब क्या माननीय पर्यावरण मंत्री और उनका मंत्रालय कुम्भकर्णी निद्रा में थे ? और अब जागे हैं जब इस आलिशान और भव्य ईमारत का निर्माण पूर्ण हो चूका है | क्या इस ईमारत को तोडना राष्ट्रीय छति नहीं होगी ? उन शहीदों और उनके परिजनों के भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं होगी ? केवल एक व्यक्ति को उसके पद से हटाकर या इस ईमारत को तोड़कर आखिर हम साबित क्या करना चाहते हैं ? क्या हम यह साबित करना चाहते हैं की हम कितने इमानदार हैं या फिर हम यह साबित करना चाहते हैं कि हमारे लिए राष्ट्रीय संपत्ति की कोई कीमत नहीं है |
                             वाकई उपरोक्त सभी बातों पर विचार करें तो यह स्पष्ट प्रतीत होता है की आज हमारे जनप्रतिनिधि और उनकी सरकार के नैतिक मूल्यों का विघटन हो चूका है इनका एक मात्र एजेंडा नोट कमाना और अपनी जेबें भरना रह गया है इनके बयानों से भी अब यह लगने लगा कि मानो ये दम्भी नेता सत्ता के  मद में चूर होकर कह रहे हों :-
                                                        मस्त रहो मस्ती में, 
                                                         आग लगे बस्ती में
 आज देश की स्थिति को देखकर भारत माँ के उन सपूतों की जिन्होंने देश की आज़ादी में अपना सबकुछ कुर्बान कर दिया उनकी आत्मा भी रोती होगी वे यह विचार करते होंगे की क्या इसी दिन के लिए भारत को आज़ाद कराया था हमने इससे अच्छा तो अंग्रेजों का शाशन था कम से कम वे बेगाने होकर भी इतना नहीं लुटते थे जितना आज हमारे अपने हमारे देश को लुट रहे हैं | शायद वे यही सोचते होंगे :-
                                         हमें तो अपनों ने लुटा गैरों में कहाँ दम था
                                      अपनी कश्ती तो वहीँ डूबी जहाँ पानी कम था
अब देश की आम जनता को जागना होगा क्योंकि देश के ये कर्णधार न जाने कब देश को बेच दें माँ भारती के सपूतों को फिर से संघर्ष प्रारंभ कर देना होगा आज फिर से देश के जवानों को भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद की भूमिका में आना होगा तभी इस देश में शुशासन की कल्पना क जा सकेगी |
                                                         जय हिंद, जय भारत 

Friday, December 24, 2010

२५ दिसंबर, दोहरी ख़ुशी का दिन....

 {दोनों चित्र गूगल से साभार}

    
                      समस्त सम्माननीय आत्मीय जनों को आपके अपने गौरव की ओर से क्रिसमस पर्व की ढेर सारी शुभकामनायें, मै प्रभु यीशु से प्रार्थना करता हूँ की वे संसार के प्रत्येक प्राणी को शुख, समृद्ध एवं स्वस्थ जीवन प्रदान करें | आज का दिन मेरे लिए दोहरी ख़ुशी का दिन है जहाँ एक ओर हम सभी उत्साह के साथ क्रिसमस का पर्व मना रहे हैं वहीँ आज २५ दिसंबर को ही मेरे आदर्श, मेरे प्रेरणाश्रोत एक व्यक्तित्व जिनसे मै बचपन से ही बेहद प्रभावित रहा ऐसे परम श्रद्धेय भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी का जन्मदिन भी है | आज का यह दिन वाकई बेहद महत्वपूर्ण है जहाँ आज के दिन त्याग और बलिदान की प्रेरणा देने वाले प्रभु यीशु का जन्म हुआ वहीँ एक सच्चे राष्ट्रवादी अटल जी का भी जन्मदिवस आज सम्प्रति राष्ट्र मना रहा है | अटल जी का व्यक्तित्व, उनका जीवन, उनकी वाणी उनके कार्य वाकई आज की युवा पीढ़ी के लिए आदर्श है |
                                                      हे प्रभु ! मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना 
                                                                गैरों को गले लगा न सकूँ 
                                                               इतनी रुखाई कभी मत देना..
                    श्रद्धेय अटल जी के ये शब्द उनकी ऊंचाई का आयाम है उनके भाषणों में, उनकी वाणी में उनके व्यक्तित्व में एक संवेदनशील कवी मुखरित होता रहा है एक ऐसा कवी जिसे हर भेदभाव से मुक्त मानव मात्र की पीड़ा दिखाई देती है | विरोधी भी जिनकी भूरी भूरी प्रसंसा करते हैं, जिनके व्यव्हार को आदर्श राजनीतिज्ञ का व्यव्हार माना जाता है, जिन्होंने देश को एक नयी दशा और दिशा प्रदान की, भारत को विश्व समुदाय में सार्थक एवं प्रभावी स्थान दिलाया, जिन्होंने विकास की एक नयी परिभाषा गढ़ी, जिन्होंने भारतीयता को एक नया आयाम दिया, जिन्होंने राष्ट्रभाषा हिंदी को विश्व मंच में सम्मान दिलाया, नैतिक मूल्यों एवं सिद्धांतों को राजनीती में स्थापित किया ऐसा महान व्यक्तित्य आज समूचे विश्व में अटल जी के अतिरिक्त और कोई नहीं है वे वाकई में अद्वितीय है | पाने और खोने की अभिलाषा से दूर उन्हें केवल देश के विकास की चिंता रही तभी वे कहते हैं - 
                                                             क्या खोया क्या पाया जग में,
                                                              मिलते और बिछड़ते मग में.
                                                              नहीं शिकायत मुझे किसी से,
                                                              यद्यपि छला गया पग पग में.
आज वह दिन अनायाश ही मुझे याद आ रहा है जब छत्तीसगढ़ के राज्योत्सव के अवसर पर कुछ ही पलों के लिए सही पर उनसे मिलने का अवसर मिला उनका चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करने का अवसर मिला वाकई उनकी स्मृति चिर स्थायी है | आज के परिवेश में जहाँ राजनेताओं में राष्ट्र के लिए कुछ करने की सोच कम अपने लिए अधिकतम करने की सोच बलवती है वहां आज उनके सक्रिय राजनीती में न होने पर उनकी कमी महसूस होती है| उनके ये शब्द -
                                                       देखा था ख्वाब जो आज हर धड़कन में है,
                                                       एक नया भारत बनाने का इरादा मन में है. 
हमें उनके मार्गों में चलने उनसे प्रेरणा लेने का सन्देश देते हैं ईश्वर उन्हें दीर्घायु शतायु स्वस्थ जीवन प्रदान करें यही आज मेरी प्रार्थना है| अंत में मै पुनः सभी को क्रिसमस एवं आदरणीय अटल जी के जन्मदिन की बधाई देता हूँ एवं श्रद्धेय अटल जी को शत शत प्रणाम करता हूँ |

Thursday, November 25, 2010

धार्मिकता के नाम पर आडम्बर क्यों ...

{जरा देखिये कितनी विषमता है जहाँ एक बालक टुकड़ों में पल रहा है वहीँ हम धार्मिकता के नाम पर लाखों करोड़ों खर्च कर रहे हैं }
{चित्र गोगल से साभार}
   वन्दे मातरम, समस्त आत्मीय जन अपने गौरव का आदाब, सतश्री अकाल, आदाब स्वीकार करें !!
                      मेरे नवोदित ब्लॉग को आप सब अपनी टिप्पणियों और आशीर्वाद से सार्थकता प्रदान कर रहे हैं तथा आप सभी का मार्गदर्शन मुझे निरंतर प्राप्त हो रहा है जिससे मुझमे अभूतपूर्व उत्साह का संचार हो रहा है | मै आप सभी के प्रति सहृदय आभार व्यक्त करता हूँ एवं आग्रह करता हूँ की मुझ अकिंचन पर आप इसी प्रकार अपना विश्वास स्नेह और आशीर्वाद बनाये रखें और अनवरत मार्गदर्शन प्रदान करते रहें | 
                       आज मै अपने विचारों को आप तक पहुँचाने और आपके विचारों को जानने के लिए पुनः उपस्थित हूँ | विगत दिनों अपने नगर रायपुर {छत्तीसगढ़} में मुझे किंचित धार्मिक आयोजनों में शामिल होने का सौभाग्य मिला जिनमे जाकर आत्मीय प्रसन्नता का अनुभव हुआ साथ ही मन कुछ कारणों से खिन्न भी हुआ | मै आज उन खिन्नता के कारणों को ही आप के साथ बाँटना चाहता हूँ | धार्मिक आयोजनों में शामिल होने से जहाँ मन में ईश्वर, देवी देवताओं के प्रति मन में आस्था और विश्वास में वृद्धि होती है वहीँ मन ऐसे आयोजनों के माध्यम से हो रहे आडम्बर पर खिन्न महसूस करता है | वर्तमान में साधू, सन्यासी, भाग्वाताचार्यों के द्वारा भी आजकल ईश्वर से अधिक स्वयं का महिमामंडन किया जाना भी मन को दुखित करता है | मै आस्था या धार्मिकता के कतई खिलाफ नहीं वरन ऐसे आयोजनों पर होने वाले अनावश्यक खर्चों एवं ईश्वर से अधिक स्वयं को समझने वाले साधू सन्यासियों के खिलाफ हूँ |
                          वर्तमान में दृष्टिगत है की इन आयोजनों पर लाखों करोड़ों रूपये के खर्च किये जाते हैं तथा उससे कहीं अधिक धन संग्रह कर आयोजकों द्वारा न जाने किस किस प्रकार से उसका उपयोग या दुरूपयोग किया जाता है यह उस देश में जहाँ अभी भी एक बड़ी संख्या में लोगों को दो वक्त का पर्याप्त भोजन भी नसीब नहीं होता यह कहाँ तक न्यायोचित है ? आज भी हमारे देश में बच्चे पैसे के आभाव में शिक्छा से वंचित हैं, ऐसे लोगों की कमी नहीं इस देश में जिन्होंने केवल धन के आभाव में ही दम तोड़ दिया, हमारे पास इसका सबसे अच्छा उदाहरण है शहनाई उस्ताद बिस्मिलाह खां एवं प्रख्यात साहित्यकार गजानन माधव मुक्तिबोध का जिन्हें धन के आभाव में या शाशन प्रशासन के लापरवाही के चलते बीमारी से जूझते हुए दम तोडना पड़ा | अगर ऐसे लोगों को इन धार्मिकता के नाम पर आडम्बर करने वाले फिजूलखर्ची करने वाले लोगों का सहयोग मिल पाता तो शायद असमय उनका निधन नहीं होता, देश के हजारों बच्चे गरीबी, भुखमरी, असिक्छा के शिकार नहीं होते |   
                        कोई ईश्वर हमें  ये नहीं कहता की हम उनको लाखों करोड़ों का चढ़ावा चढ़ाएं या उन्हें सोने चांदी  के सिहासन पर विराजमान करें | और सभी की इतनी सामर्थ्य भी नहीं है, आज दृष्टिगत होता है की सामर्थ्यवान व्यक्ति अपनी शक्ति को प्रदर्शित करने के उद्देश्य से अधिक दान करता है और उससे भी अधिक उसका प्रचार करता है और ऐसे व्यक्ति जिनकी सामर्थ्य नहीं है वह उन्हें देखकर दुखी होते हैं यह कहाँ तक न्यायोचित है ? अगर हम ईश्वर को प्रसन्न करना चाहते हैं तो हमें कुछ ऐसा कार्य करना चाहिए जिससे हम मानवमात्र की सेवा कर सकें, अगर हम किसी जरूरतमंद युवा को रोजगार मुहैया करते हैं या किसी अशिक्छित बालक को विद्यादान देते हैं, किसी निर्धन की मदद करते हैं तो ईश्वर ऐसे ही प्रसन्न हो जाता है तो फिर हमें आडम्बर की क्या आवश्यकता ? हमें इस विषय पर चिंतन अवश्य करना चाहिए और मानवमात्र की सेवा कर अपनी आस्था, अपनी श्रद्धा को और अधिक सार्थकता प्रदान करनी चाहिए | मेरा आग्रह है की आप इस विषय पर चिंतन अवश्य करें और मुझे अपने विचारों से अवश्य अवगत कराएँ |

Saturday, November 13, 2010

स्वतंत्रता किस रूप में...

{चित्र गूगल से साभार}

वन्दे मातरम,
         समस्त आत्मीय जनों को आपके अपने गौरव शर्मा "भारतीय" की ओर से आदाब, सतश्री अकाल, सादर प्रणाम  !!

              हमारा भारत वर्ष विश्व का महान राष्ट्र है जहाँ सभी को अपनी बातों को कहने की स्वतंत्रता संविधान के माध्यम से प्रदान की गयी है, जिसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहा जाता हैं और हम इस संवैधानिक व्यवस्था का ह्रदय से सम्मान करते हैं | लोकतंत्र में यह आवश्यक भी है की प्रत्येक नागरिक को सामान रूप से स्वतंत्रता और भावाभिव्यक्ति का अधिकार प्रदान किया जाये  पर वर्तमान में घटित कुछ घटनाओं पर नजर डालने पर अनायास ही मन में यह सवाल उत्पन्न होता है की स्वतंत्रता किस रूप में और किस स्तर तक प्रदान किया जाना चाहिए | वर्तमान में दृष्टिगत हो रहा है की कुछ तथाकथित देशभक्त, लेखक, राजनीतिज्ञ, कलाकार और भी न जाने कैसे कैसे लोग जिनके मन में जो भी आया बेखटके कह जाते हैं और वह भी बिना सोचे समझे की उनकी कही बात का जन सामान्य पर क्या असर हो सकता है | निश्चित रूप से आज मिडिया और प्रसारण तंत्र भी दिन प्रतिदिन अधिक शक्तिशाली होती जा रही है और उन बातों को भी प्रसारित करने से नहीं चुकती जिन्हें प्रसारित नहीं किया जाना चाहिए, मिडिया के माध्यम से तत्काल लोगों के द्वारा कहे जाने वाले अनावश्यक बयान और टिपण्णी भी कुछ ही समय में देशभर में प्रसारित हो जाती है और प्रारंभ हो जाता है आरोप-प्रत्यारोप और वाद विवाद का सिलसिला और कुछ मामलों में तो बात दंगे फसाद तक जा पहुँचती है, इससे  नुकसान अगर किसी का होता है तो बेचारे जन सामान्य का जिसका इन सभी विवादों से दूर दूर तक कोई नाता नहीं होता है| अगर इस निरंकुश स्वतंत्रता के अधिकार के कारण देश जल उठता है और जन धन की हानी बेवजह ही होती है तो हमें विचार करना होगा की यह कहाँ तक न्यायोचित है | वर्तमान समय की आवश्यकता है की हमें इन विषयों पर चिंतन कर सार्थक निष्कर्ष तक पहुंचना होगा |
                       विगत दिनों में ऐसे कई मामले दृष्टिगत होते हैं जिनमे आवेश में आकर बेहद गैर जिम्मेदार रवैये के साथ किसी भी मंच से कुछ भी कह दिया गया उदाहरण के रूप में हम बुकर अवार्ड से सम्मानित लेखिका अरुंधती राय या चाल, चरित्र और चेहरे की बात करने वाले और स्वयं को सबसे बड़ा देशभक्त संगठन मानने वाले आर. एस. एस. के पूर्व प्रमुख सुदर्शन जी को ले सकते हैं | इनके द्वारा दिए गए बयानों में किसी भी प्रकार की सार्थकता या देश की समस्याओं के प्रति चिता का भाव तो कतई नहीं है वरन देश को बाँटने और विवाद उत्पन्न करने वाले भाव अवश्य हैं | कभी कभी तो मन में यह सवाल आता है की क्या सच में ऐसे तत्व देशभक्त हो सकते हैं ? क्या वाकई इनके मन में देश के लिए सकारात्मक विचार झें ? कैसे कोई व्यक्ति किसी मंच से कश्मीर के विषय में विवादस्पद बयान दे सकता है और कैसे कोई अनुभवी व्यक्ति देश की एक सम्मानित महिला के खिलाफ अनावश्यक, अनर्गल एवं असंसदीय टिपण्णी कर सकता है |
                          मुझे बचपन में सुनी हुई एक कहानी याद आ रही है जिसका उल्लेख मै यहाँ अवश्य करना चाहूँगा, एक बार एक चीटी हाथी के पीठ में बैठकर कहीं जा रही होती है और वह उससे बार बार एक ही सवाल कर रही होती है की देखो तुम्हे कोई तकलीफ तो नहीं हो रही है न ? बोलो तो मै उतर जाती हूँ ? हाथी उसकी बात समझ नहीं पाता, अब रास्ते में एक पुल आने वाला होता है और फिर से चीटी हाथी से उसके कान के बेहद करीब  जाकर पूछती है, देखो पुल आने वाला है अभी भी वक्त है तुम कहो तो मै उतर जाती हूँ हाथी बेचारा भिनभिनाहट के अलावा कुछ भी समझ नहीं पाता है, दरअसल वह चीटी अपने होने का अहसास करना चाहती थी, अपने "अस्तित्व का अहसास" आज हमारे तथाकथित देशभक्त, राजनीतिज्ञ और भी न जाने कैसे कैसे लोग यही कर रहे हैं वे भी अपने होने का, अपने अस्तित्व का अहसास करना चाहते हैं | यहाँ मुख्य रूप से दो बिंदु विचारणीय है, प्रथम:- क्या किसी भी व्यक्ति को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कहीं भी कुछ भी बोलने का अधिकार होना चाहिए ? द्वितीय :- क्या मिडिया और प्रसारण तंत्र को स्वतंत्रता के नाम पर कुछ भी दीखाने का अधिकार होना चाहिए जिससे देश में नकारात्मक प्रभाव भी क्यों न उत्पन्न हो ?
                  मेरा उद्देश्य किसी की आलोचना करना या किसी संवैधानिक व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाना कतई नहीं है, पर जब हमारे देश के तथाकथित चिन्तक पथभ्रष्ट हो जाते हैं और टी. आर. पी. और पैसा कमाने  के लिए टेलीविजन चैनलों पर कुछ भी समाचार एवं कार्यक्रम दिखाया जाता है {कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है की इस मामले में कलर्स चैनल और उसके कार्यक्रम "बिग बोस" ने तो इस मामले में  हद ही कर दिया है } तो एक आम भारतीय होने के नाते पीड़ा होती है | मेरा उद्देश्य इन मामलों पर सार्थक चिंतन करना है जिससे हमारे महान देश की संस्कृति को तार तार होने से बचाया जा सके और तथाकथित लोगों पर अंकुश लग  सके | मै अपने समस्त आत्मीय जनों से विनम्र अपील करता हूँ की इस विषय पर अपनी महत्वपूर्ण राय से अवश्य अवगत कराएँ |
"जय हिंद जय भारत"