Friday, June 14, 2013

चौरासी साल के युवा थे विद्या भैया...




 - गौरव शर्मा "भारतीय"

सुकमा के दरभा घाटी में बर्बर नक्सली हमले में घायल विद्याचरण शुक्ल अंततः छत्तीसगढ़ को रोता बिलखता छोड़कर चले गए। उनके निधन के साथ ही उस स्वर्णिम युग का भी अवसान हो गया जिसमे उन्होंने 50 वर्षों से भी अधिक समय तक देश की राजनीति की दशा व दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई। चौरासी वर्ष के इस बुजुर्ग राजनेता को कभी वयोवृद्ध नहीं कहा गया। वे सदैव विद्या भैया का संबोधन ही पाते रहे। उनके साथ बुजुर्गों की भीड़ नहीं बल्कि युवाओं की फ़ौज हुआ करती थी। विद्या भैया युवाओं के प्रेरणाश्रोत रहे हैं। युवा कार्यकर्ताओं को उनके आशीर्वाद व मार्गदर्शन में अपना उज्ज्वल भविष्य नजर आया करता था। उनके हजारों समर्थकों को विश्वास था कि वे एक बार फिर छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को पुनर्जीवित कर देंगे। विद्या भैया एक ऐसे राजनेता थे जिन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में अपने साथ साथ छत्तीसगढ़ को भी स्थापित किया। नौ बार उन्होंने भारतीय संसद में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व किया। दिल्ली में रायपुर की पहचान थे विद्या भैया। इंदिरा गाँधी, पीवीनरसिम्हा राव, वीपी सिंह व चंद्रशेखर के मंत्रिमंडल में वीसी शुक्ल कई महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री रहे। एक समय उनकी गिनती देश के सर्वाधिक ताकतवर राजनेताओं में होने लगी थी। उन्हें भावी प्रधानमंत्री के रूप में भी देखा जाने लगा था। आपातकाल के समय विद्याचरण शुक्ल केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री थे। मीडिया को नियंत्रित करने व इंदिरा गाँधी के निर्देशों का अक्षरशः पालन करवाने के लिए उनके कार्यकाल को आज भी याद किया जाता है। 2 अगस्त 1929 को रायपुर में जन्में विद्याचरण शुक्ल ने नागपुर के मौरिस कालेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। राजनीति में आने से पहले उन्होंने एक शिकार कंपनी भी बनाई पर जब उनका मन इस काम में नहीं लगा तो उन्होंने अपने पिता पंडित रविशंकर शुक्ल की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए राजनीति में सक्रिय हुए और 1957 में महासमुंद लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़कर सबसे कम उम्र के सांसद बनने का गौरव हासिल किया। उनकी रूचि हमेशा राष्ट्रीय राजनीति में रही पर छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद वे प्रथम मुख्यमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार माने गए। उनके पिता मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री थे अतः उनकी भी इच्छा थी कि प्रथम मुख्यमत्री बनकर वे छत्तीसगढ़ को गढ़ सकें। एक ऐसे छत्तीसगढ़ का निर्माण कर सकें जो शांत समृद्ध व खुशहाल हो। जहाँ हर वर्ग को सामान अवसर प्राप्त हो पर उनका यह स्वप्न अधुरा ही रह गया। वे छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री नहीं बन सके। 2013 का विधानसभा चुनाव उनके लिए फिर एक अवसर लेकर आया था। विद्या भैया पूरी शिद्दत से कांग्रेस को छत्तीसगढ़ में पुनर्जीवित व स्थापित करने में जुटे थे। परिवर्तन यात्रा के प्रारंभ से सुकमा के अंतिम सभा तक वे साथ रहे। चौरासी वर्ष की उम्र में भी उनकी चुस्ती और फुर्ती देखकर युवा कार्यकर्त्ता भी अचंभित हो जाते। बावजूद तमाम परेशानियों के उनके चेहरे पर कभी तनाव नजर नहीं आया करता था। वे जब भी कार्यकर्ताओं या आम लोगों के सामने आते तो उनके चेहरे पर सहज मुस्कान होती और यही मुस्कान उनके हजारों समर्थकों में अभूतपूर्व उत्साह का संचार कर देती। लंबे राजनैतिक जीवन में उन्होंने कभी किसी पर अनर्गल आरोप नहीं लगाए। कभी किसी के दिल को ठेस पहुंचाने वाली टिपण्णी नहीं की। यही वजह है कि कांग्रेस के साथ ही अन्य राजनैतिक दलों में भी उनके मित्र थे। छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के संबंध में विद्याचरण शुक्ल का योगदान अविस्मरणीय था। उन्होंने बस्तर से लेकर सरगुजा तक यात्रा की जिसमे युवा वर्ग ने बढ़ चढ़कर भाग लिया। दिल्ली में उन्होंने अपने हजारों समर्थकों के साथ गिरफ्तारी भी दी। कई वर्षों तक वे छत्तीसगढ़ संघर्ष मोर्चा के बैनरतले राज्य निर्माण के लिए संघर्ष करते रहे। राज्य बनने के बाद जब उन्हें लगा कि जिन उद्देश्यों के लिए छत्तीसगढ़ का निर्माण किया गया था उन्हीं उद्देश्यों की अनदेखी की जा रही है तो वे विरोध करने से भी नहीं चुके। छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़िया के हित की रक्षा के लिए उन्होंने कांग्रेस का परित्याग करने से भी परहेज नहीं किया। इसीलिए आज उनके चले जाने के बाद एक छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक शून्य पैदा हो गया है। उनके हजारों समर्थक स्वयं को अनाथ महसूस कर रहे हैं। विद्याचरण शुक्ल के साथ वह स्वर्णिम दौर भी थम गया जिसके बगैर छत्तीसगढ़ के राजनीति का इतिहास अधुरा है। सच कहा जाए तो छत्तीसगढ़ की राजनीति में फिर कोई विद्या भैया पैदा होगा इसकी संभावना कम ही है।

Saturday, June 8, 2013

तोते की व्यथा...


-गौरव शर्मा "भारतीय"

मेरा नाम तोताराम है ! जी हाँ... मै वही तोताराम हूँ जो कल तक लोगों को उनका भविष्य बताया करता था। लचर प्रशासनिक तंत्र व कुछ भ्रष्ट नौकरशाहों की वजह से इन दिनों मै चर्चा में हूँ। हाल ही में देश के उच्चतम न्यायालय ने मेरी तुलना सीबीआई से कर दी है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा टिप्पणी करने के बाद ही मै चर्चा में आया हूँ। इस टिप्पणी के बाद मीडिया ने मुझे सर आँखों पर बैठा लिया। लोग मेरी तस्वीरों के साथ प्रदर्शन करने लगे। स्वार्थ के सागर में गले तक डूब चुके कुछ लोगों ने तो मेरे नाम का प्रयोग करने के लिए कापीराईट कराने की भी तैयारी कर ली है। जो भी हो पर मुझे इस टिप्पणी से गहरा आघात पहुंचा है कि मेरी तुलना सीबीआई से की गई। अब आप ही बताइए, बार बार रंग बदलने वाले सीबीआई की तुलना मुझसे करना कहाँ तक उचित है ? कभी शेर की तरह दहाड़ने तो कभी चूहे की तरह भयभीत होने वाली सीबीआई की तुलना आखिर तोते से कैसे की जा सकती है ? जब-जब देश में सरकार बदलती है, सीबीआई गिरगिट की तरह रंग बदलती है। आश्चर्य है कि सीबीआई की तुलना मुझसे की जाती है जबकि न मै अवसरवादी हूँ और न पलायनवादी। मै तो कल तक लोगों को उनका भविष्य बताया करता था। `तपतकुरु` और `राम-राम` जप कर लोगों को हर क्षण ईश्वर के करीब होने का संदेश दिया करता था। और आज... मुझे एक कथा की याद आ रही है, एक बार किसी नगर में धर्मसभा का आयोजन हुआ। उसमे भाग लेने देश भर से विद्वतजन पहुंचे। मै भी अपने विद्वान स्वामी के साथ उस सभा में पहुंचा। जब मेरे स्वामी के बोलने का समय आया तो उन्होंने मुझे सामने कर दिया और कहा कि मुझसे अधिक विद्वान मेरा तोता है, सभा में यही शास्त्रार्थ करेगा। मैंने अपने स्वामी द्वारा सिखाई गई सारी बातें सभा में उपस्थित जनों को बताई। मैंने अमन का संदेश देकर सभी को स्तब्ध कर दिया, पर अफ़सोस उस समय मीडिया नहीं हुआ करता था इसलिए उसका अटेंशन नहीं मिला। सच कहूँ तो मेरी नाराजगी उच्चतम न्यायालय से नहीं है, मै नाराज हूँ उन दो कौड़ी के नेताओं से जिन्होंने मुझे एक दूसरे को नीचा दिखाने का माध्यम बना लिया है। मै नाराज हूँ तथ्यहीन खबर दिखाने व अनर्गल प्रलाप करने वाली मीडिया से जिसे हर ऐरी गैरी बात को ब्रेकिंग न्यूज़ बनाने की आदत है। मुझे यह कहने में संकोच नहीं है कि इसी वजह से मै अब शहरों व गावों में आसानी से नजर नहीं आता। इसी वजह से मै चुपचाप पिंजरे में पड़ा राम नाम जपता रहता हूँ। भले मेरी तुलना कोई सीबीआई से करे पर मै जनता हूँ कि मैंने आज तक किसी के साथ पक्षपात नहीं किया अपने स्वामी के हितों की रक्षा के लिए कभी किसी को डराया-धमकाया नहीं। मैंने तो हमेशा प्रेम, सद्भाव, संवेदनशीलता व एकता का पैगाम दिया है। न जाने लोग क्यों मेरी तुलना सीबीआई से कर मेरा अपमान करने पर अमादा हैं। खैर... मै तो गाँधी के सिद्धांतों पर चलने वाला तुच्छ प्राणी हूँ। ईश्वर से यही प्रार्थना कर सकता हूँ कि वे लोगों को सद्बुद्धि दे। गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले सीबीआई को इतना हौसला दे कि वह भी मेरी तरह सच को सच और झूठ को झूठ कहने का सहस कर सके। आपने मेरी व्यथा-कथा को सुना इसलिए मै आप इंसानों का दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ। 

(विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित)

Friday, May 31, 2013

क्या ऐसे ख़त्म होगा नक्सलवाद...

क्या ऐसे ख़त्म होगा नक्सलवाद...


- गौरव शर्मा "भारतीय"

प्रदेश में हुए नक्सली हमले के बाद एक बार फिर आरोप-प्रत्यारोप, बैठकों व आश्वासनों का दौर प्रारंभ हो गया है। कांग्रेसी राज्य सरकार पर परिवर्तन यात्रा को पर्याप्त सुरक्षा न देने का आरोप लगा रहे हैं वहीँ मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह कांग्रेसियों को ऐसे मामले पर राजनीति न करने की सलाह दे रहे हैं। तमाम गतिविधियों के बीच नक्सलवाद के सफाए का मुद्दा एक बार फिर गौण हो गया है। राज्य सरकार सर्वदलीय बैठक व विधानसभा के वशेष सत्र के माध्यम से नक्सलवाद के खिलाफ रणनीति तय करने का प्रयास कर रही है। कांग्रेस ने इस बैठक का ही बहिष्कार कर दिया है। प्रश्न यह है कि क्या सर्वदलीय बैठक, विधानसभा का विशेष सत्र या दो चार अधिकारियों पर कार्रवाई से नक्सलवाद समाप्त होगा ? कांग्रेसी चाहते हैं कि मुख्यमंत्री इस्तीफ़ा दें, क्या उनके इस्तीफे से नक्सलवाद की समस्या समाप्त होगी या कांग्रेस के दिवंगत नेता वापस आ जाएंगे ? यक्ष प्रश्न है कि नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई के लिए और कितनी घटनाओं का इंतजार किया जा रहा है? इस हमले ने जितने प्रश्न राज्य सरकार के समक्ष खड़े किये हैं उतने ही प्रश्न केंद्र के समक्ष भी है। सबसे पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय कटघरे में खड़ा है कि नक्सल प्रभावित राज्य सरकारों के साथ समन्वित रणनीति बनाकर कार्य क्यों नहीं किया जा रहा है? हकीकत यह है कि 1967 से लेकर 2013 तक नक्सलवाद पर बातें तो खूब की गई किन्तु आज तक केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा स्पष्ट रणनीति नहीं बनाई जा सकी जिससे नक्सलवाद के खात्मे की दिशा में निरंतर प्रयास किया जा सके। नक्सलियों ने तब से लेकर अबतक स्वयं को ताकतवर बनाने की दिशा में निरंतर कार्य किया पर हमारी सरकारें कमजोर ही साबित हुईं। नक्सलवाद से लड़ाई के नाम पर आज भी तीर कमान लिए आदिवासियों की कल्पना की जाती है जबकि नक्सली रॉकेट लांचर तक बना चुके हैं। पुलिस के जवानों से अपेक्षा की जाती है कि कई साल पुराने हथियार लेकर वे एके 47 व 56 जैसे अत्याधुनिक हथियारों का सामना करें। आखिर यह कैसे संभव है? जब तक जवानों को पर्याप्त सुरक्षा उपकरण, बेहतर संवाद व्यवस्था व उनके परिजनों को संरक्षण नहीं दिया जाएगा तबतक कोई जवान आखिर कैसे नक्सलियों के सामने सीना तानकर खड़ा होने का साहस कर पाएगा। समस्या यह है कि आज भी हम पुलिस बनकर या जनप्रतिनिधि बनकर नक्सलियों से लड़ने के बारे में सोचते हैं जबकि अपराधी को पकड़ने के लिए अपराधी की तरह सोचा जाना आवश्यक है। इसी तरह अगर नक्सलियों के हौसले पस्त करना हैं तो उनकी तरह ही सोचना होगा। उनकी हरकतों पर नजर रखकर उसके मुकाबले उत्कृष्ट कार्ययोजना का निर्धारण करना होगा। उनकी भाषा, कार्यशैली व मंशा को समझना होगा। जिस तरह नक्सलियों ने बस्तर के सुदूर अंचलों तक अपना नेटवर्क स्थापित किया है, उसी तरह हमारे जवानों को भी आदिवासियों का विश्वास अर्जित करना होगा। उनसे बेहतर संवाद व तालमेल स्थापित कर अपना नेटवर्क नक्सलियों से भी मजबूत करना होगा। यह भी विचार करने की आवश्यकता है कि यह सब क्या उन जवानों व कर्मचारियों द्वारा संभव है जिन्हें सजा काटने के लिए बस्तर भेजा गया है। बस्तर को प्रदेश के सबसे संवेदनशील व कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों व कर्मचारियों की आवश्यकता है पर बस्तर का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा की वहां पदस्थ अधिकांश कर्मचारी किसी भी तरह अपने दिन काटने व अपने मन पसंद स्थान में स्थानान्तरण कराने में लगे हैं। मंत्रियों और प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा संतुष्टिजनक कार्य न करने पर कर्मचारियों को बस्तर भेजने की धमकी दी जाती है। इसका आशय यह है कि बस्तर को सेल्युलर जेल मान लिया गया है जहाँ कर्मचारियों को कालापानी की सजा के लिए भेजा जाता है। नक्सलवाद का समाधान करने की दिशा में निरंतर प्रयास का इससे बेहतर समय और नहीं हो सकता। प्रदेश ही नहीं देश की जनता भी अब चाहती है कि राम जी का ननिहाल कहलाने वाले प्रदेश में अब राम राज्य स्थापित हो। छत्तीसगढ़ में एक ऐसा राज आए कि बस्तर के आदिवासी से लेकर प्रदेश का अंतिम व्यक्ति तक शांति समृद्धि व खुशहाली के साथ मुस्कुरा सके। चारों ओर हर्ष का वातावरण निर्मित हो सके। आवश्यकता इस बात की है कि अब नक्सलवाद के उन्मूलन की दिशा में इमानदारी पूर्वक ठोस प्रयास किया जाए न कि कोरे आश्वासनों व आरोप-प्रत्यारोप में समय व्यर्थ गंवाया जाए।
(प्रदेश के विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित आलेख)

Tuesday, May 14, 2013

लो मै आ गया...

विभिन्न भाव भंगिमाओं में आपका अपना गौरव शर्मा "भारतीय"
प्रदेश के मुख्यमंत्री माननीय डॉ रमन सिंह के साथ आपका अपना गौरव शर्मा "भारतीय"


प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के साथ आपका अपना गौरव शर्मा "भारतीय"

Monday, May 13, 2013

लो मै आ गया...


वन्दे मातरम,
समस्त सम्माननीय आत्मीय जनों को आपके अपने गौरव शर्मा "भारतीय" की ओर से सादर प्रणाम, आदाब, सतश्री अकाल !! आज लगभग डेढ़ साल बाद मै ब्लॉगजगत में फिर से कदम रखा हूँ... जीवन की आपाधापी में ऐसा मशगुल हुआ कि कुछ ब्लॉग जगत से नाता ही टूट गया। मगर मेरे शुभचिंतकों व आत्मीय जनों के प्यार ने मुझे एक बार फिर ब्लॉग लिखने पर मजबूर कर दिया। अब मै आप सभी को विशवास दिलाता हूँ कि नियमित रूप से अपने संदेशों व विचारों के साथ आप सभी के बीच उपस्थित होता रहूँगा। आशा ही नहीं वरन विश्वास है कि जिस तरह पहले मुझे आप सभी ने स्नेह और आशीर्वाद प्रदान किया, निरंतर प्रदान करते रहेंगे।
- गौरव शर्मा "भारतीय"

काश! पाकिस्तान भी भारत जैसा होता..

(भारत, पाक का मिलन, आपका अपना गौरव शर्मा "भारतीय" पाकिस्तानी नागरिकों के साथ)
गौरव शर्मा 'भारतीय'
काश, मेरा जन्म भारत में हुआ होता तो मुझे इस पवित्र धरती में कदम रखने के लिए 23 साल तक इंतजार न करना पड़ता। यह कहना है पाकिस्तान से भारत आये जत्थे के सदस्य गोपाल अग्रवाल का। गोपाल कहते हैं कि भारत आकर जो ख़ुशी मिली है उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। यही वो धरती है जिसमें सारे धर्मों, जातियों व लोगों को समेटने और भरपूर प्यार करने की क्षमता है। गोपाल पाकिस्तान के सिंध प्रांत से आये हैं। उनका कहना है कि कई सालों से वे भारत आने और इस धरती को करीब से देखने के इच्छुक थे पर 23 सालों बाद उन्हें यह मौका मिला। भारतीयों से मिले मान-सम्मान व स्वागत से अभिभूत होकर वे कहते हैं, सुना तो था कि भारत में अतिथि को भगवान का दर्जा दिया जाता है यहां आकर यह देख भी लिया। विदित हो कि इन दिनों राजधानी के शदाणी दरबार में अमृतसर के वाघा बार्डर के रास्ते पाकिस्तान से 184 श्रद्धालुओं का जत्था दर्शन करने आया है। इसमें 37 महिलाएं व 8 बच्चे भी हैं। पाकिस्तान के चारों प्रांतों से आए लोग कल ही रायपुर पहुंचे हैं। यहाँ शदाणी दरबार परिसर में ही उनके ठहरने की व्यवस्था की गई है। उनकी सेवा के लिए आसपास के लोग अपने रोजमर्रा के काम को छोड़कर लगे हुए हैं। पाकिस्तानी यात्री छत्तीसगढ़ के धार्मिक स्थानों के साथ ही हरिद्वार, वैष्णव देवी, शिमला, दिल्ली व अमृतसर भी जाएंगे। 8 जून को उनकी पाकिस्तान वापसी होगी। पाकिस्तान के हालात के बारे में पूछने पर पाकिस्तानी श्रद्धालु हिचकते हुए कहते हैं कि 'सब ठीक हैÓ पर उनका दर्द उभर कर सामने आ ही जाता है। उनका कहना है कि वहां की आवाम बहुत ही अच्छी है। लोगों से कोई खतरा नहीं है मगर सियासी लोगों व कट्टरपंथी ताकतों की वजह से आज भी दंगे फसाद और उन्माद की आशंका बनी रहती है। हालांकि वे यह बताना भी नहीं भूलते की उन्हें अपनी धार्मिक रीति रिवाजों के पालन में कोई कठिनाई नहीं है। सिंध के घोटकी जिले से आए रतनलाल वंजारा कहते हैं कि वहां और यहाँ बहुत सी समानताएं हैं। पाकिस्तान की ही तरह भारत की आवाम भी अच्छी है। गौरतलब है कि पाकिस्तान में इन दिनों चुनावी सरगर्मी जोरों पर है। आज ही वहां मतदान है। चुनाव के विषय पर बात करते हुए पाकिस्तानी नागरिक कहते हैं कि इस बार कुछ कहा नहीं जा सकता पर नवाज शरीफ की पार्टी का अभी जोर है। क्रिकेट से सियासत में आए इमरान खान की पार्टी तहरीक ए इंसाफ में भी लोग अब भरोसा करने लगे हैं। उनकी पार्टी में पढ़े-लिखे व बुद्धिजीवी लोगों की बड़ी तादाद है। इस बार तहरीक ए इंसाफ भी अच्छा प्रदर्शन कर सकती है। बिलावल भुट्टो व हिना रब्बानी खार के रिश्तों की बात आने पर पाकिस्तानी नागरिक कुछ नहीं कहते पर उनकी मुस्कान सब कुछ बयान कर जाती है। बहरहाल, पाकिस्तानियों से मिलने व उनसे बात करने पर यह स्पष्ट होता है कि वे भी दोनों देशों के बीच दोस्ती व अमन के पक्षधर हैं। उनकी इच्छा है कि भारत की ही तरह पाकिस्तान में भी लोकतंत्र कायम हो और अमन का वातावरण बने। जिस तरह भारत में अल्पसंख्यक सुरक्षित हैं उसी तरह पाकिस्तान के भी हिन्दू अल्पसंख्यकों को सुरक्षा व विकास का वातावरण मिले।
स्पष्टीकरण / जानकारी के लिए कृपया संपर्क करें
कार्यालय फ़ोन
: 91-120-3025800/01/02/03
मोबाइल फ़ोन: +91-9313437447
अथवा ई-मेल करे support@ians.in

Sunday, January 8, 2012

हिंदी हिंद की शान है...

जय हिंद,
 समस्त आत्मीय जनों को आपके अपने गौरव शर्मा "भारतीय" की ओर से सादर प्रणाम, आदाब, सतश्री अकाल !!
,
मेरा आप सभी से एक प्रश्न है कि हम अपनी मातृभाषा हिन्दी का प्रयोग न कर किसी अन्य भाषा का प्रयोग क्यों करें  ?
मित्रों, हमें अंग्रेजी बोलने में गर्व का अनुभव होता है जबकि गर्व हमें इस बात पर होना चाहिए कि अंग्रेजी के अधिकांश शब्द हमारी प्रचिनतम भाषा, देववाणी संस्कृत से लिए गये हैं और उससे भी अधिक गर्व हमें इस बात पर होना चाहिए कि दुनिया में बोली जाने वाली लगभग 14,000 बोली, भाषा और विभाषाओँ को व्याकरण के चौदह सुत्र प्रदान करने वाले महान ब्रम्हर्षि पाणनीय "भारतीय" थे...
मेरा आप सभी से निवेदन है -
हिन्दी बोलिए.
हिन्दी लिखिए..

हिन्दी पढ़िए...
  क्योंकि हिन्दी हिन्द की शान है, क्योंकि हिन्दी भारत की पहचान है, क्योँकि हिन्दी मात्र एक भाषा नहीं है वरन हिन्दी हमारी मातृभाषा है।
जय भारत, जय अभियान भारतीय...!!